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केन-बेतवा में मुआवजा या खेल ? सूत्रों के मुताबिक बाहरी लोगों ने भी फर्जी तरीके से लिया मुआवजा क्या अब जांच में होगी वसूली ?

केन-बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा… या फिर “मौका” वितरण ? केन बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा वितरण में विसंगतियों को लेकर चल रहे प्रदर्शन प्रशासन के आश्वासन के बाद स्थगित कर दिया गया है लेकिन मामले में अब सबकी नजर प्रशासन की जांच में टिकी हुई है  सूत्रों के अनुसार छतरपुर जिले के डूब क्षेत्र के गांवों में बड़ा फर्जीवाड़ा किया गया है जिनका हक था,वो लाइन में खड़े रह गए…और जिनका कोई लेना-देना नहीं गांव के भी नहीं ऐसे कई लोगों के खातों में पैसा पहुंच गया ये सिस्टम की गलती है या सेटिंग का कमाल ? पिछले 12 दिन तक ग्रामीण चिता पर लेटे रहे प्रदर्शन किया,तब जाकर फाइलें खुलीं और जांच दल बन गया। सवाल ये है क्या जांच सच सामने लाएगी ? अब सीधे सवाल प्रशासन से क्या फर्जी मुआवजा लेने वालों से वसूली होगी ? क्या मिलीभगत करने वाले पटवारी बच पाएंगे ? और जो असली हकदार हैं…उन्हें उनका हक मिलेगा ? या फिर हमेशा की तरह…मामला उठेगा,सुर्खियां बनेगी,और फिर सब कुछ “ठंडे बस्ते” में चला जाएगा ?

छतरपुर जिले के नौगांव में हुआ दर्दनाक हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारी पूरी व्यवस्था पर लगा हुआ एक बदनुमा दाग है

क्या छतरपुर में ज़िंदगी की कीमत सिर्फ ₹20 हज़ार रह गई है ?


समीर अवस्थी

छतरपुर जिले के नौगांव में हुआ दर्दनाक हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही और बेलगाम भ्रष्टाचार का जीता-जागता उदाहरण है। नगर पालिका द्वारा कराए जा रहे तोरण द्वार निर्माण कार्य के दौरान ढांचा गिरने से एक मजदूर की मौके पर ही मौत हो गई, तीन मजदूर गंभीर रूप से घायल हैं और मलबे में कई और मजदूरों के दबे होने की आशंका जताई जा रही है। यह हादसा कई सवाल खड़े करता है और हर सवाल व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा है।

सबसे बड़ा और शर्मनाक सवाल यह है कि क्या छतरपुर में एक गरीब मजदूर की ज़िंदगी की कीमत सिर्फ ₹20 हज़ार तय कर दी गई है? हादसे के बाद प्रशासन द्वारा पीड़ित परिवार को दी जाने वाली तात्कालिक सहायता के नाम पर महज़ ₹20 हज़ार की घोषणा करना, जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। क्या इतनी सी राशि से एक परिवार अपने कमाने वाले सदस्य की मौत का दर्द, भविष्य की चिंता और बच्चों की ज़िम्मेदारी उठा सकता है?

यह हादसा अचानक नहीं हुआ। बिना सुरक्षा मानकों, बिना तकनीकी जांच, बिना योग्य इंजीनियरों की निगरानी के निर्माण कार्य कराना आम बात हो गई है। सवाल यह है कि जब तोरण द्वार जैसे सार्वजनिक निर्माण हो रहे थे, तब सुरक्षा उपकरण क्यों नहीं थे? मजदूरों के लिए हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट, और अन्य जरूरी इंतज़ाम क्यों नहीं किए गए? क्या गुणवत्ता की जांच हुई थी? या फिर ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी जेब भरने के लिए मजदूरों की जान दांव पर लगा दी?

नगर पालिका, ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। सिर्फ मुआवज़े की औपचारिक घोषणा कर देने से प्रशासन अपने कर्तव्यों से मुक्त नहीं हो सकता। यह सीधा-सीधा आपराधिक लापरवाही का मामला है। जिन लोगों ने घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया, जिन्होंने सुरक्षा नियमों को नजरअंदाज किया, और जिन्होंने आंखें मूंदकर काम चलाया उन सब पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

आज सवाल सिर्फ एक मजदूर की मौत का नहीं है, सवाल उस सोच का है जिसमें गरीब की जान सस्ती और भ्रष्टाचार की कीमत महंगी हो गई है। अगर इस हादसे के बाद भी दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो यह तय है कि कल फिर किसी और निर्माण स्थल पर किसी और गरीब की जान जाएगी, और प्रशासन फिर कुछ हजार रुपये का चेक पकड़ाकर अपने कर्तव्यों से पल्ला झाड़ लेगा।

अब वक्त आ गया है कि छतरपुर की जनता सवाल पूछे
आखिर कब तक लापरवाही और भ्रष्टाचार की बलि चढ़ती रहेंगी गरीबों की ज़िंदगियां ? और कब तय होगी उन लोगों की जवाबदेही, जो कुर्सियों पर बैठकर मौत के सौदे कर रहे हैं?

समीर अवस्थी

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