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क्या संवेदनशील मुद्दे पर गंभीर है छतरपुर प्रशासन ? सर्वे दल के “फोटो सेशन” से बबाल

छतरपुर में बार-बार आंदोलन क्यों भड़क रहे हैं ? सर्वे की गंभीरता पर उठते सवाल,फोटो सेशन बना चर्चा का विषय छतरपुर : केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना एक बार फिर विवादों और आंदोलनों के घेरे में दिखाई दे रही है। परियोजना के तहत छतरपुर जिले के ढोड़न क्षेत्र में बांध निर्माण कार्य जारी है, लेकिन डूब प्रभावित ग्रामीण लगातार सर्वे और मुआवजा प्रक्रिया में विसंगतियों के आरोप लगा रहे हैं। अप्रैल 2026 में किसान नेता अमित भटनागर के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीणों ने 12 दिनों तक “चिता आंदोलन” चलाकर प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। आंदोलनकारियों का आरोप था कि प्रभावित परिवारों का सर्वे सही तरीके से नहीं किया गया और मुआवजा निर्धारण में भी भारी अनियमितताएं हैं। प्रशासन द्वारा आश्वासन दिए जाने के बाद आंदोलन स्थगित हुआ, लेकिन ग्रामीणों ने चेतावनी दी थी कि यदि निष्पक्ष सर्वे नहीं हुआ तो बड़ा आंदोलन दोबारा किया जाएगा। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए छतरपुर कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक स्वयं गांव-गांव पहुंचे और ग्रामीणों से संवाद किया। इसके बाद प्रशासन ने अलग-अलग सर्...

छतरपुर में विरोध का बदलता स्वरूप चिंताजनक,खाकी का अपमान,समाज का नुकसान

छतरपुर में बिगड़ता माहौल विरोध के नाम पर खाकी से बदसलूकी कब तक ?
छतरपुर जिले का माहौल इन दिनों चिंताजनक होता जा रहा है

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला में किसी भी प्रकार का ज्ञापन सौंपना हो या विरोध प्रदर्शन करना हो,कुछ लोग अपनी सीमाएँ लांघते हुए खाकी वर्दी के साथ बदसलूकी पर उतारू हो जाते हैं। 

यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि समाज की सोच पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।विरोध करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाना गलत नहीं है, लेकिन उस आवाज में संयम और मर्यादा होना भी उतना ही आवश्यक है। 

पुलिसकर्मी हमारी सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं। वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं किसी के बेटे,भाई या पिता हैं। ऐसे में ज्ञापन सौंपते समय या प्रदर्शन के दौरान उनसे अभद्रता करना या खाकी पर हाथ उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

खाकी वर्दी व्यवस्था और सुरक्षा का प्रतीक है यदि हम उसी व्यवस्था को कमजोर करने लगेंगे,तो आखिर हमारी मांगें पूरी कैसे होंगी? पुलिस को प्रताड़ित कर, उन्हें उकसा कर या उन पर प्रहार कर हम अपनी ही समस्याओं को और जटिल बना देते हैं। लोकतंत्र संवाद से चलता है, टकराव से नहीं।आज जरूरत है कि हम अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाएँ। प्रशासन तक अपनी बात मजबूती से, लेकिन शालीनता के साथ रखें। विरोध हो, पर वह शांतिपूर्ण हो। मांगें हों, पर उनमें तर्क और संयम हो। तभी समाज में संतुलन बना रहेगा और समस्याओं का समाधान भी संभव होगा।

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