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हर साल रावण जलता है,फिर भी समाज में रावण जिंदा क्यों है ?

दशहरा केवल पुतला दहन का पर्व नहीं,बल्कि अपने भीतर और समाज में मौजूद बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लेने का अवसर है

हर साल दशहरे पर देशभर में रावण के पुतले जलाए जाते हैं। मैदानों में हजारों लोगों की भीड़ जुटती है, आतिशबाजी होती है,जयकारे गूंजते हैं और सत्य की विजय तथा अधर्म के विनाश का संदेश दिया जाता है। यह परंपरा हमारी संस्कृति,आस्था और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आदर्शों से जुड़ी हुई है। रावण का दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।

लेकिन हर साल मन में एक सवाल उठता है कि जब हम सदियों से रावण का दहन करते आ रहे हैं,तो समाज में बुराइयां आज भी क्यों मौजूद हैं ? आखिर वह कौन-सा रावण है,जो हर साल पुतले के रूप में जल जाता है, लेकिन अगले दिन फिर हमारे आसपास दिखाई देने लगता है ?

दरअसल,रावण केवल रामायण का एक पात्र नहीं,बल्कि अहंकार,अन्याय,सत्ता के दुरुपयोग और दूसरे की मर्यादा का अपमान करने जैसी बुराइयों का प्रतीक भी है। दशहरा हमें इन बुराइयों के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है। लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने इस पर्व के वास्तविक संदेश को केवल एक आयोजन तक सीमित कर दिया है?

हम मैदान में खड़े रावण के पुतले को जलाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। कुछ देर के लिए बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं और फिर अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट जाते हैं। मगर समाज में जब किसी महिला के साथ अत्याचार होता है, किसी गरीब के अधिकारों का हनन होता है, किसी कमजोर की आवाज दबाई जाती है, किसी निर्दोष को न्याय के लिए भटकना पड़ता है या भ्रष्टाचार के कारण आम आदमी परेशान होता है, तब हमारा विरोध कितना मुखर होता है?

यही वह सवाल है, जिस पर समाज को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

हम दूसरों को मर्यादा,धर्म और नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं,लेकिन जब उन्हीं आदर्शों की परीक्षा हमारे सामने आती है,तब कई बार चुप्पी साध लेते हैं। गलत होते देखकर भी नजरें फेर लेना,अन्याय के सामने खामोश रहना और अपने स्वार्थ के लिए सच का साथ छोड़ देना भी उन बुराइयों को मजबूत करता है,जिन्हें हम दशहरे पर समाप्त करने का संकल्प लेते हैं।

यह भी सच है कि समाज में हर व्यक्ति ऐसा नहीं है। अनेक लोग अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हैं, पीड़ितों की मदद करते हैं और अपने स्तर पर बदलाव लाने का प्रयास करते हैं। लेकिन एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए केवल कुछ लोगों का जागरूक होना पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि आम नागरिक भी अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग बने।

सवाल यह भी है कि क्या बुराई केवल किसी दूसरे व्यक्ति में है ? क्या हमने कभी अपने भीतर झांककर देखा है ? जब हम अपने पद,पैसे या प्रभाव का गलत इस्तेमाल करते हैं, किसी कमजोर व्यक्ति को अपमानित करते हैं, अपने लाभ के लिए नियमों की अनदेखी करते हैं या किसी गलत काम को सिर्फ इसलिए स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि उससे हमें फायदा होता है, तब क्या हम उस बुराई को बढ़ावा नहीं दे रहे होते, जिसके प्रतीक के रूप में रावण का पुतला जलाया जाता है?

दशहरे का वास्तविक अर्थ केवल एक पुतले का दहन नहीं, बल्कि अपने आचरण में बदलाव लाना भी है। भगवान श्रीराम के आदर्श हमें सत्य, न्याय, मर्यादा और कर्तव्य का मार्ग दिखाते हैं। इन आदर्शों को जीवन में उतारना ही इस पर्व के संदेश को सार्थक बना सकता है।

समाज में बदलाव की शुरुआत किसी बड़े आंदोलन से ही हो,यह जरूरी नहीं। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, किसी पीड़ित का साथ देना,भ्रष्टाचार को बढ़ावा न देना, महिलाओं का सम्मान करना, कमजोरों के अधिकारों की रक्षा करना और गलत को गलत कहने का साहस रखना भी बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

हमें यह समझना होगा कि किसी उत्सव की सार्थकता केवल उसकी भव्यता से नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली प्रेरणा से तय होती है। यदि दशहरे के बाद भी हमारे व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आता, तो हमें इस पर्व के संदेश पर आत्ममंथन जरूर करना चाहिए।

इसलिए इस दशहरे पर सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि रावण का पुतला कितने फीट ऊंचा था और आतिशबाजी कितनी शानदार हुई। सवाल यह होना चाहिए कि हमने अपने भीतर की किस बुराई को समाप्त करने का संकल्प लिया और समाज में अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए क्या किया?

रावण हर साल जलता है, लेकिन समाज की बुराइयां तभी समाप्त होंगी, जब हम उन्हें पहचानने और उनके खिलाफ खड़े होने का साहस जुटाएंगे।

क्योंकि सच्ची विजय केवल मैदान में रावण का पुतला जलाने से नहीं, बल्कि जीवन में सत्य,न्याय और मानवीय मूल्यों को अपनाने से होगी।

इस दशहरे पर संकल्प लें पुतला ही नहीं,अपने भीतर की बुराइयों को भी जलाएंगे और समाज में अन्याय के खिलाफ खामोश नहीं रहेंगे।

यही दशहरे का वास्तविक संदेश है और यही एक बेहतर समाज की शुरुआत भी।

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