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केन-बेतवा में मुआवजा या खेल ? सूत्रों के मुताबिक बाहरी लोगों ने भी फर्जी तरीके से लिया मुआवजा क्या अब जांच में होगी वसूली ?

केन-बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा… या फिर “मौका” वितरण ? केन बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा वितरण में विसंगतियों को लेकर चल रहे प्रदर्शन प्रशासन के आश्वासन के बाद स्थगित कर दिया गया है लेकिन मामले में अब सबकी नजर प्रशासन की जांच में टिकी हुई है  सूत्रों के अनुसार छतरपुर जिले के डूब क्षेत्र के गांवों में बड़ा फर्जीवाड़ा किया गया है जिनका हक था,वो लाइन में खड़े रह गए…और जिनका कोई लेना-देना नहीं गांव के भी नहीं ऐसे कई लोगों के खातों में पैसा पहुंच गया ये सिस्टम की गलती है या सेटिंग का कमाल ? पिछले 12 दिन तक ग्रामीण चिता पर लेटे रहे प्रदर्शन किया,तब जाकर फाइलें खुलीं और जांच दल बन गया। सवाल ये है क्या जांच सच सामने लाएगी ? अब सीधे सवाल प्रशासन से क्या फर्जी मुआवजा लेने वालों से वसूली होगी ? क्या मिलीभगत करने वाले पटवारी बच पाएंगे ? और जो असली हकदार हैं…उन्हें उनका हक मिलेगा ? या फिर हमेशा की तरह…मामला उठेगा,सुर्खियां बनेगी,और फिर सब कुछ “ठंडे बस्ते” में चला जाएगा ?

सवालों के घेरे में CMHO छतरपुर के सैकड़ों कर्मचारियों का वेतन अटका अब साहब मांग रहे 20 दिन का समय

सवालों के घेरे में CMHO छतरपुर के सैकड़ों आउटसोर्स कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं

छतरपुर : जिले के स्वास्थ्य विभाग में पदस्थ सैकड़ों आउटसोर्स कर्मचारियों की ज़िंदगी प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ती नज़र आ रही है। कई महीनों से वेतन न मिलने से कर्मचारियों के सामने परिवार चलाने का संकट खड़ा हो गया है। शिकायतों के बावजूद न तो एजेंसी पर कार्रवाई हुई और न ही कर्मचारियों के खाते में वेतन पहुँचा जानकारी के अनुसार, इस पूरे मामले में जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आर.पी. गुप्ता की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने बार-बार संबंधित अधिकारियों को शिकायत दी, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

कलेक्टर ने दिया था आदेश,कार्रवाई फिर भी नहीं

जानकारी के मुताबिक 17 मार्च 2025 को तत्कालीन कलेक्टर ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि जिस एजेंसी ने कर्मचारियों का वेतन रोका है, उसका अनुबंध तत्काल निरस्त किया जाए। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी न तो अनुबंध रद्द हुआ और न ही एजेंसी पर कोई कार्रवाई की गई।

सवाल यह है कि कलेक्टर के आदेश के बाद भी यह फ़ाइल किस मेज़ पर अटक गई?

CMHO की सफाई से और बढ़े सवाल

मामला जब मीडिया में पहुंचा तो मुख्य चिकित्सा अधिकारी आर.पी. गुप्ता ने कहा कि उन्हें कलेक्टर के आदेश की जानकारी नहीं है और कई “तकनीकी कारणों” से देरी हो रही है। हालाँकि इससे पहले वही अधिकारी एजेंसी को लापरवाही पर नोटिस जारी कर चुके हैं अब सवाल उठ रहा है 

➡️ अगर अधिकारी को आदेश की जानकारी नहीं थी, तो नोटिस कैसे जारी हुआ ?

➡️ और अगर जानकारी थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

कर्मचारी बोले साहब सुनते हैं,करते कुछ नहीं

वेतन न मिलने से परेशान कर्मचारियों ने मंगलवार को जनसुनवाई में एक बार फिर अपनी आपबीती सुनाई। कर्मचारियों ने कहा,

“हम महीनों से काम कर रहे हैं, लेकिन पैसे नहीं मिले। परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। हर बार कहा जाता है कि जांच चल रही है, लेकिन नतीजा शून्य है।”

20 दिन की मोहलत, उम्मीदों का सहारा

मीडिया में मामला उजागर होने के बाद अब कर्मचारियों की समस्याओं को दूर करने के लिए 20 दिन का समय दिया गया है। हालाँकि,कर्मचारियों में यह आशंका है कि यह वादा भी पहले की तरह काग़ज़ों तक ही सीमित न रह जाए।

सरकार की साख पर भी सवाल

यह मामला अब सिर्फ वेतन का नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। अब देखना होगा कि मध्य प्रदेश सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस लापरवाही पर क्या कदम उठाते हैं 
क्या छतरपुर के इन कर्मचारियों को उनका हक़ मिलेगा या एक बार फिर फ़ाइलों की धूल में दब जाएगा यह मामला?


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