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क्या मेंढकों की आवाज़ सुनाने के लिए काटी जा रही है बिजली ?

टर्र-टर्र के बीच अंधेरे में जनता,आखिर बिजली विभाग कब जागेगा ? समीर अवस्थी बरसात का मौसम आते ही गांव-गांव में मेंढकों की टर्र-टर्र सुनाई देने लगी है। कहीं लोक परंपरा के तहत मेंढक-मेंढकी का विवाह कराया जा रहा है, तो कहीं अच्छी बारिश की कामना में लोग पूजा-पाठ कर रहे हैं। आस्था और परंपरा भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं, उनका सम्मान होना चाहिए। लेकिन इन सबके बीच एक और परंपरा ऐसी है जो हर साल निभाई जाती है अघोषित बिजली कटौती छतरपुर के बमीठा क्षेत्र में बिजली गायब है क्षेत्र के कई  गांव अंधेरे में डूबा हुआ है। लोग मज़ाक में कह रहे हैं कि शायद बिजली विभाग ने भी सोचा होगा कि जब मेंढकों की बारात निकल रही है तो लाइट बंद कर दो,ताकि जनता प्रकृति का संगीत पूरे सुकून से सुन सके। यह लेख भले ही हंसी पैदा करे,लेकिन इसके पीछे जनता की गहरी पीड़ा छिपी है आखिर सवाल यह है कि जब आधुनिक भारत,डिजिटल इंडिया और स्मार्ट व्यवस्था की बातें हो रही हैं,तब ग्रामीण क्षेत्रों में घंटों अघोषित बिजली कटौती क्यों? यदि लाइन में तकनीकी खराबी है तो उसकी सूचना क्यों नहीं? यदि रखरखाव का कार्य है तो उसका समय पहले से...

बमीठा में श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर विवाद की गाज 50 साल पुरानी परंपरा टूटी,समिति भंग

छतरपुर। बमीठा में 50 वर्षों से लगातार हो रहा श्री कृष्ण जन्मोत्सव इस साल नहीं होगा। आयोजन समिति ने कार्यक्रम रद्द करने और खुद को भंग करने का ऐलान कर दिया है। वजह ? अध्यक्ष पद पर पूर्व सरपंच जमाल खान और हिंदू संगठनों का तीखा विरोध।

हिंदू संगठनों का कहना है कि हिंदू धार्मिक आयोजन में मुस्लिम अध्यक्ष की मौजूदगी परंपरा के साथ खिलवाड़ है। वहीं,समर्थकों का दावा है कि जमाल खान ने पहले भी कई सामाजिक कार्य किए हैं और उन्हें इस तरह अलग करना गलत है।

सवाल उठता है क्या जमाल खान के बिना कार्यक्रम नहीं हो सकता था ? क्या एक व्यक्ति के पद पर रहने के कारण आधी सदी पुरानी परंपरा को तोड़ना जरूरी था ?

बमीठा में श्री कृष्ण जन्मोत्सव का रद्द होना केवल एक धार्मिक कार्यक्रम का बंद होना नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक ताने-बाने की दरार को उजागर करता है जो वर्षों की परंपरा, आस्था और आपसी भरोसे से बुना गया था।

एक व्यक्ति के पद और पहचान को लेकर खड़ा हुआ विवाद इस हद तक बढ़ा कि आधी सदी पुरानी परंपरा टूट गई। इससे यह साफ संकेत जाता है कि जब व्यक्तिगत अहं, साम्प्रदायिक भावनाएं और राजनीति, सांस्कृतिक आयोजनों पर हावी हो जाती हैं, तो सदियों की विरासत भी पल भर में मिट सकती है।

असल सवाल यह है — क्या आने वाली पीढ़ी इस टूटन से सबक लेकर परंपराओं को बचाने का रास्ता निकालेगी, या फिर यह आयोजन इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा?


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