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मैं खजुराहो मुझे बचाओ - मंदिरों की नगरी में नशे का साया जिम्मेदार बेखबर ?

खजुराहो के वेस्टर्न ग्रुप ऑफ टेंपल के मुख्य द्वार के पास शराब ठेका,चंदेलकालीन शिवसागर तालाब बना शराबियों का अड्डा जिम्मेदार बेखबर  खजुराहो केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और विश्व मंच पर देश की ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। यहां स्थित खजुराहो मंदिर समूह को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है और हर साल देश-विदेश से हजारों पर्यटक इसकी अद्भुत स्थापत्य कला और इतिहास को देखने पहुंचते हैं। विशेष रूप से वेस्टर्न ग्रुप ऑफ टेंपल खजुराहो का सबसे प्रमुख और सर्वाधिक भ्रमण किया जाने वाला परिसर है। लेकिन इन दिनों जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे खजुराहो की प्रतिष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। वेस्टर्न ग्रुप ऑफ टेंपल के मुख्य प्रवेश द्वार के पास संचालित शराब ठेके से शराब खरीदकर कुछ लोग पास स्थित चंदेलकालीन शिवसागर तालाब में बैठकर खुलेआम शराब पीते दिखाई दे रहे हैं। तालाब के किनारों पर बिखरी शराब की बोतलें और गंदगी न केवल ऐतिहासिक धरोहर की गरिमा को ठेस पहुंचा रही हैं, बल्कि आने वाले पर्यटकों के सामने भी खजुराहो की नकारात्मक छवि प्रस्तुत कर रही हैं। खजुराहो की प...

बमीठा में श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर विवाद की गाज 50 साल पुरानी परंपरा टूटी,समिति भंग

छतरपुर। बमीठा में 50 वर्षों से लगातार हो रहा श्री कृष्ण जन्मोत्सव इस साल नहीं होगा। आयोजन समिति ने कार्यक्रम रद्द करने और खुद को भंग करने का ऐलान कर दिया है। वजह ? अध्यक्ष पद पर पूर्व सरपंच जमाल खान और हिंदू संगठनों का तीखा विरोध।

हिंदू संगठनों का कहना है कि हिंदू धार्मिक आयोजन में मुस्लिम अध्यक्ष की मौजूदगी परंपरा के साथ खिलवाड़ है। वहीं,समर्थकों का दावा है कि जमाल खान ने पहले भी कई सामाजिक कार्य किए हैं और उन्हें इस तरह अलग करना गलत है।

सवाल उठता है क्या जमाल खान के बिना कार्यक्रम नहीं हो सकता था ? क्या एक व्यक्ति के पद पर रहने के कारण आधी सदी पुरानी परंपरा को तोड़ना जरूरी था ?

बमीठा में श्री कृष्ण जन्मोत्सव का रद्द होना केवल एक धार्मिक कार्यक्रम का बंद होना नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक ताने-बाने की दरार को उजागर करता है जो वर्षों की परंपरा, आस्था और आपसी भरोसे से बुना गया था।

एक व्यक्ति के पद और पहचान को लेकर खड़ा हुआ विवाद इस हद तक बढ़ा कि आधी सदी पुरानी परंपरा टूट गई। इससे यह साफ संकेत जाता है कि जब व्यक्तिगत अहं, साम्प्रदायिक भावनाएं और राजनीति, सांस्कृतिक आयोजनों पर हावी हो जाती हैं, तो सदियों की विरासत भी पल भर में मिट सकती है।

असल सवाल यह है — क्या आने वाली पीढ़ी इस टूटन से सबक लेकर परंपराओं को बचाने का रास्ता निकालेगी, या फिर यह आयोजन इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा?


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