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केन-बेतवा में मुआवजा या खेल ? सूत्रों के मुताबिक बाहरी लोगों ने भी फर्जी तरीके से लिया मुआवजा क्या अब जांच में होगी वसूली ?

केन-बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा… या फिर “मौका” वितरण ? केन बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा वितरण में विसंगतियों को लेकर चल रहे प्रदर्शन प्रशासन के आश्वासन के बाद स्थगित कर दिया गया है लेकिन मामले में अब सबकी नजर प्रशासन की जांच में टिकी हुई है  सूत्रों के अनुसार छतरपुर जिले के डूब क्षेत्र के गांवों में बड़ा फर्जीवाड़ा किया गया है जिनका हक था,वो लाइन में खड़े रह गए…और जिनका कोई लेना-देना नहीं गांव के भी नहीं ऐसे कई लोगों के खातों में पैसा पहुंच गया ये सिस्टम की गलती है या सेटिंग का कमाल ? पिछले 12 दिन तक ग्रामीण चिता पर लेटे रहे प्रदर्शन किया,तब जाकर फाइलें खुलीं और जांच दल बन गया। सवाल ये है क्या जांच सच सामने लाएगी ? अब सीधे सवाल प्रशासन से क्या फर्जी मुआवजा लेने वालों से वसूली होगी ? क्या मिलीभगत करने वाले पटवारी बच पाएंगे ? और जो असली हकदार हैं…उन्हें उनका हक मिलेगा ? या फिर हमेशा की तरह…मामला उठेगा,सुर्खियां बनेगी,और फिर सब कुछ “ठंडे बस्ते” में चला जाएगा ?

बमीठा में श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर विवाद की गाज 50 साल पुरानी परंपरा टूटी,समिति भंग

छतरपुर। बमीठा में 50 वर्षों से लगातार हो रहा श्री कृष्ण जन्मोत्सव इस साल नहीं होगा। आयोजन समिति ने कार्यक्रम रद्द करने और खुद को भंग करने का ऐलान कर दिया है। वजह ? अध्यक्ष पद पर पूर्व सरपंच जमाल खान और हिंदू संगठनों का तीखा विरोध।

हिंदू संगठनों का कहना है कि हिंदू धार्मिक आयोजन में मुस्लिम अध्यक्ष की मौजूदगी परंपरा के साथ खिलवाड़ है। वहीं,समर्थकों का दावा है कि जमाल खान ने पहले भी कई सामाजिक कार्य किए हैं और उन्हें इस तरह अलग करना गलत है।

सवाल उठता है क्या जमाल खान के बिना कार्यक्रम नहीं हो सकता था ? क्या एक व्यक्ति के पद पर रहने के कारण आधी सदी पुरानी परंपरा को तोड़ना जरूरी था ?

बमीठा में श्री कृष्ण जन्मोत्सव का रद्द होना केवल एक धार्मिक कार्यक्रम का बंद होना नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक ताने-बाने की दरार को उजागर करता है जो वर्षों की परंपरा, आस्था और आपसी भरोसे से बुना गया था।

एक व्यक्ति के पद और पहचान को लेकर खड़ा हुआ विवाद इस हद तक बढ़ा कि आधी सदी पुरानी परंपरा टूट गई। इससे यह साफ संकेत जाता है कि जब व्यक्तिगत अहं, साम्प्रदायिक भावनाएं और राजनीति, सांस्कृतिक आयोजनों पर हावी हो जाती हैं, तो सदियों की विरासत भी पल भर में मिट सकती है।

असल सवाल यह है — क्या आने वाली पीढ़ी इस टूटन से सबक लेकर परंपराओं को बचाने का रास्ता निकालेगी, या फिर यह आयोजन इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा?


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