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छतरपुर में विरोध का बदलता स्वरूप चिंताजनक,खाकी का अपमान,समाज का नुकसान

छतरपुर में बिगड़ता माहौल विरोध के नाम पर खाकी से बदसलूकी कब तक ? छतरपुर जिले का माहौल इन दिनों चिंताजनक होता जा रहा है मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला में किसी भी प्रकार का ज्ञापन सौंपना हो या विरोध प्रदर्शन करना हो,कुछ लोग अपनी सीमाएँ लांघते हुए खाकी वर्दी के साथ बदसलूकी पर उतारू हो जाते हैं।  यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि समाज की सोच पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।विरोध करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाना गलत नहीं है, लेकिन उस आवाज में संयम और मर्यादा होना भी उतना ही आवश्यक है।  पुलिसकर्मी हमारी सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं। वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं किसी के बेटे,भाई या पिता हैं। ऐसे में ज्ञापन सौंपते समय या प्रदर्शन के दौरान उनसे अभद्रता करना या खाकी पर हाथ उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। खाकी वर्दी व्यवस्था और सुरक्षा का प्रतीक है यदि हम उसी व्यवस्था को कमजोर करने लगेंगे,तो आखिर हमारी मांगें पूरी कैसे होंगी? पुलिस को प्रताड़ित कर, उन्हें उकसा कर या उन पर प्रहार कर हम अपनी ही समस्याओं ...

इतिहास में कंस,आज कौन ? छतरपुर के बमीठा में कृष्ण जन्मोत्सव आयोजन पर लगी रोक पर उठे सवाल,मोहन राज में कृष्ण महोत्सव पर रोक क्यों ?

कृष्ण जन्मोत्सव में आई बाधाएं इतिहास से लेकर आज तक 

भगवान श्रीकृष्ण का जीवन केवल भक्ति और प्रेम की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष और बाधाओं को पार करने की प्रेरणा भी है। जन्म से लेकर बाल्यकाल तक, हर कदम पर उनके मार्ग में रुकावटें खड़ी की गईं फिर चाहे वह कंस का अत्याचार हो,यमुना का तेज़ बहाव,या असुरों के लगातार हमले।

इतिहास की बाधाएं

कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ। मामा कंस ने भविष्यवाणी सुनी कि देवकी का आठवां पुत्र ही उसका अंत करेगा, इसलिए उसने माता-पिता को जेल में डाल दिया। जन्म की रात,वासुदेव जी ने शिशु कृष्ण को टोकरी में रखकर मथुरा से गोकुल पहुंचाने का प्रयास किया। रास्ते में मूसलधार बारिश और यमुना का प्रचंड बहाव भी उनकी राह में बाधा बना। लेकिन ईश्वरीय शक्ति से सभी रुकावटें दूर हुईं। बचपन में पूतना, शकटासुर, त्रिणावर्त जैसे राक्षसों को भेजा गया,मगर हर बार कृष्ण ने खतरे को हराकर भक्ति और धर्म की रक्षा की।

आज की बाधाएं छतरपुर के बमीठा की घटना

इतिहास की ये बाधाएं केवल पौराणिक कथाएं नहीं,बल्कि आज भी हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि धर्म और आस्था के मार्ग में रुकावटें क्यों आती हैं। हाल ही में छतरपुर जिले के बमीठा में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन अचानक रद्द कर दिया गया। वर्षों से होता आ रहा यह कार्यक्रम इस बार न हो पाने से स्थानीय लोगों में निराशा और नाराजगी है। और कई सवाल है 

समिति और समाज की जिम्मेदारी

अगर आयोजन में प्रशासनिक, राजनीतिक या सामाजिक कारणों से बाधा उत्पन्न हो रही हो,तो समिति के सदस्यों का दायित्व है कि वह आगे आकर सच्चाई बताएं। कृष्ण की कथा हमें यही सिखाती है धर्म की रक्षा के लिए साहस, एकता और पारदर्शिता जरूरी है। आज जरूरत है कि हम गोकुलवासियों की तरह संगठित हों और आस्था के पर्व को जीवित रखें।

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