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क्या मेंढकों की आवाज़ सुनाने के लिए काटी जा रही है बिजली ?

टर्र-टर्र के बीच अंधेरे में जनता,आखिर बिजली विभाग कब जागेगा ? समीर अवस्थी बरसात का मौसम आते ही गांव-गांव में मेंढकों की टर्र-टर्र सुनाई देने लगी है। कहीं लोक परंपरा के तहत मेंढक-मेंढकी का विवाह कराया जा रहा है, तो कहीं अच्छी बारिश की कामना में लोग पूजा-पाठ कर रहे हैं। आस्था और परंपरा भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं, उनका सम्मान होना चाहिए। लेकिन इन सबके बीच एक और परंपरा ऐसी है जो हर साल निभाई जाती है अघोषित बिजली कटौती छतरपुर के बमीठा क्षेत्र में बिजली गायब है क्षेत्र के कई  गांव अंधेरे में डूबा हुआ है। लोग मज़ाक में कह रहे हैं कि शायद बिजली विभाग ने भी सोचा होगा कि जब मेंढकों की बारात निकल रही है तो लाइट बंद कर दो,ताकि जनता प्रकृति का संगीत पूरे सुकून से सुन सके। यह लेख भले ही हंसी पैदा करे,लेकिन इसके पीछे जनता की गहरी पीड़ा छिपी है आखिर सवाल यह है कि जब आधुनिक भारत,डिजिटल इंडिया और स्मार्ट व्यवस्था की बातें हो रही हैं,तब ग्रामीण क्षेत्रों में घंटों अघोषित बिजली कटौती क्यों? यदि लाइन में तकनीकी खराबी है तो उसकी सूचना क्यों नहीं? यदि रखरखाव का कार्य है तो उसका समय पहले से...

इतिहास में कंस,आज कौन ? छतरपुर के बमीठा में कृष्ण जन्मोत्सव आयोजन पर लगी रोक पर उठे सवाल,मोहन राज में कृष्ण महोत्सव पर रोक क्यों ?

कृष्ण जन्मोत्सव में आई बाधाएं इतिहास से लेकर आज तक 

भगवान श्रीकृष्ण का जीवन केवल भक्ति और प्रेम की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष और बाधाओं को पार करने की प्रेरणा भी है। जन्म से लेकर बाल्यकाल तक, हर कदम पर उनके मार्ग में रुकावटें खड़ी की गईं फिर चाहे वह कंस का अत्याचार हो,यमुना का तेज़ बहाव,या असुरों के लगातार हमले।

इतिहास की बाधाएं

कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ। मामा कंस ने भविष्यवाणी सुनी कि देवकी का आठवां पुत्र ही उसका अंत करेगा, इसलिए उसने माता-पिता को जेल में डाल दिया। जन्म की रात,वासुदेव जी ने शिशु कृष्ण को टोकरी में रखकर मथुरा से गोकुल पहुंचाने का प्रयास किया। रास्ते में मूसलधार बारिश और यमुना का प्रचंड बहाव भी उनकी राह में बाधा बना। लेकिन ईश्वरीय शक्ति से सभी रुकावटें दूर हुईं। बचपन में पूतना, शकटासुर, त्रिणावर्त जैसे राक्षसों को भेजा गया,मगर हर बार कृष्ण ने खतरे को हराकर भक्ति और धर्म की रक्षा की।

आज की बाधाएं छतरपुर के बमीठा की घटना

इतिहास की ये बाधाएं केवल पौराणिक कथाएं नहीं,बल्कि आज भी हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि धर्म और आस्था के मार्ग में रुकावटें क्यों आती हैं। हाल ही में छतरपुर जिले के बमीठा में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन अचानक रद्द कर दिया गया। वर्षों से होता आ रहा यह कार्यक्रम इस बार न हो पाने से स्थानीय लोगों में निराशा और नाराजगी है। और कई सवाल है 

समिति और समाज की जिम्मेदारी

अगर आयोजन में प्रशासनिक, राजनीतिक या सामाजिक कारणों से बाधा उत्पन्न हो रही हो,तो समिति के सदस्यों का दायित्व है कि वह आगे आकर सच्चाई बताएं। कृष्ण की कथा हमें यही सिखाती है धर्म की रक्षा के लिए साहस, एकता और पारदर्शिता जरूरी है। आज जरूरत है कि हम गोकुलवासियों की तरह संगठित हों और आस्था के पर्व को जीवित रखें।

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