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छतरपुर में विरोध का बदलता स्वरूप चिंताजनक,खाकी का अपमान,समाज का नुकसान

छतरपुर में बिगड़ता माहौल विरोध के नाम पर खाकी से बदसलूकी कब तक ? छतरपुर जिले का माहौल इन दिनों चिंताजनक होता जा रहा है मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला में किसी भी प्रकार का ज्ञापन सौंपना हो या विरोध प्रदर्शन करना हो,कुछ लोग अपनी सीमाएँ लांघते हुए खाकी वर्दी के साथ बदसलूकी पर उतारू हो जाते हैं।  यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि समाज की सोच पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।विरोध करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाना गलत नहीं है, लेकिन उस आवाज में संयम और मर्यादा होना भी उतना ही आवश्यक है।  पुलिसकर्मी हमारी सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं। वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं किसी के बेटे,भाई या पिता हैं। ऐसे में ज्ञापन सौंपते समय या प्रदर्शन के दौरान उनसे अभद्रता करना या खाकी पर हाथ उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। खाकी वर्दी व्यवस्था और सुरक्षा का प्रतीक है यदि हम उसी व्यवस्था को कमजोर करने लगेंगे,तो आखिर हमारी मांगें पूरी कैसे होंगी? पुलिस को प्रताड़ित कर, उन्हें उकसा कर या उन पर प्रहार कर हम अपनी ही समस्याओं ...

सिंघाड़ा बेचती बूढ़ी अम्मा,ले लो भैया सपोर्ट लोकल

सपोर्ट लोकल,सपोर्ट छोटे दुकानदार

छतरपुर के बमीठा चौराहे पर शाम ढलने के साथ चौराहे में हलचल बढ़ने लगी थी। सड़क के किनारे,एक बूढ़ी अम्मा अपनी छोटी सी दुकान लगाए बैठी थी। उनके दुकान में गर्मागरम सिंघाड़े रखे हुए थे,और उनके पास एक पुरानी चटाई बिछी थी। अम्मा के चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सा साहस और ताजगी थी, जैसे उन्होंने बहुत कुछ देखा और झेला हो

बुधवार का दिन सर्दी की शाम थी, हवा में ठंडक महसूस हो रही थी, लेकिन अम्मा का चेहरा गर्मी से भरा था। वह धीरे-धीरे, हर गुजरते हुए हर व्यक्ति से कहती, “ले लो, सिंघाड़ा भैया,सर्दी में राहत देता है!

कुछ लोग नजरअंदाज कर जाते, कुछ लोग मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते, लेकिन अम्मा का मन कभी नहीं टूटता। उनकी आवाज़ में एक अद्भुत विश्वास था, जैसे वह जानती थी कोई न कोई उनके पास जरूर आएगा।

हमारा जिम्मा, छोटे दुकानदारों का सपोर्ट

आजकल हम जब भी सड़क पर चलते हैं, छोटे-छोटे दुकानदारों की छोटी सी दुकानों से गुजरते हैं। जिनमें से कुछ लोग मूंगफली, सिंघाड़ा, चाय या अन्य ताजे खाद्य पदार्थ बेचते हैं। ये दुकानदार हमारी आँखों से ओझल हो जाते हैं, लेकिन उनका संघर्ष और मेहनत हर दिन हमें दिखती है।

आपने कभी सोचा है, वो बूढ़ी अम्मा जो बमीठा चौराहे पर सिंघाड़े बेचती है, वह क्यों हर दिन वहां बैठी रहती है? क्यों वह हर गुजरते व्यक्ति से यही कहती है, "मूंगफली ले लो, सिंघाड़ा ले लो"?

इन छोटे दुकानदारों के लिए, यह सिर्फ एक व्यापार नहीं, बल्कि उनके जीवन का आधार है। उनकी मेहनत और संघर्ष ही उनके दिन की शुरुआत और अंत बनते हैं। वे रोज़ अपनी छोटी सी दुकान पर बैठकर हमें कुछ सस्ता और ताजे खाने का मौका देते हैं, पर इसके बदले में उन्हें बहुत कम मिल पाता है।

इसलिए, हमें उनका सपोर्ट करना चाहिए। छोटे दुकानदारों से मूंगफली खरीदें, सिंघाड़ा खरीदें, और अपने छोटे से योगदान से उनकी मदद करें। यह उनके लिए न केवल आर्थिक रूप से मददगार होता है, बल्कि एक आत्मिक संतोष भी देता है कि लोग उनकी मेहनत को पहचानते हैं।

हम सभी की जिम्मेदारी बनती है कि हम इन छोटे दुकानदारों को उनका हक दिलवाएं। वे हमारे शहर और समाज का अहम हिस्सा हैं। तो अगली बार जब आप सड़क पर चलें, किसी छोटे दुकानदार से कुछ खरीदें और उनके संघर्ष को समझने की कोशिश करें।




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