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केन-बेतवा में मुआवजा या खेल ? सूत्रों के मुताबिक बाहरी लोगों ने भी फर्जी तरीके से लिया मुआवजा क्या अब जांच में होगी वसूली ?

केन-बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा… या फिर “मौका” वितरण ? केन बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा वितरण में विसंगतियों को लेकर चल रहे प्रदर्शन प्रशासन के आश्वासन के बाद स्थगित कर दिया गया है लेकिन मामले में अब सबकी नजर प्रशासन की जांच में टिकी हुई है  सूत्रों के अनुसार छतरपुर जिले के डूब क्षेत्र के गांवों में बड़ा फर्जीवाड़ा किया गया है जिनका हक था,वो लाइन में खड़े रह गए…और जिनका कोई लेना-देना नहीं गांव के भी नहीं ऐसे कई लोगों के खातों में पैसा पहुंच गया ये सिस्टम की गलती है या सेटिंग का कमाल ? पिछले 12 दिन तक ग्रामीण चिता पर लेटे रहे प्रदर्शन किया,तब जाकर फाइलें खुलीं और जांच दल बन गया। सवाल ये है क्या जांच सच सामने लाएगी ? अब सीधे सवाल प्रशासन से क्या फर्जी मुआवजा लेने वालों से वसूली होगी ? क्या मिलीभगत करने वाले पटवारी बच पाएंगे ? और जो असली हकदार हैं…उन्हें उनका हक मिलेगा ? या फिर हमेशा की तरह…मामला उठेगा,सुर्खियां बनेगी,और फिर सब कुछ “ठंडे बस्ते” में चला जाएगा ?

खजुराहो : दो दिन में उखड़ी प्रधान मंत्री सड़क ने बनाया नया रिकॉर्ड, क्या सड़क निर्माण कंपनी को मिलना चाहिए ऑस्कर अवॉर्ड ?

सरकारें जिन विकास के दावों को लेकर अपना पीठ थपथपाती है उन विकास के दावों की पोल खुलती है ग्राउंड जीरो पर 
छतरपुर पन्ना नेशनल हाईवे 39 पर बसे टोरिया गांव से सूरजपुर तक प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी सड़क की दुर्दशा देखकर लगता है कि निर्माण कंपनी को कोई बड़ा पुरस्कार दिया जाना चाहिए महज दो ही दिन में सड़क का ऐसा हाल हुआ है, जैसे ठेकेदारों ने निर्माण से ज्यादा उखाड़ने की प्रतियोगिता में भाग लिया हो दो दिन में सड़क उखड़ने का यह कोई साधारण काम तो नहीं है मानो ऐसा लगता है जैसे कंपनी ने ‘सड़क उखाड़ने’ को अपनी कला बना लिया है
गांव के लोगों में काफी नाराजगी है बताया गया पहले से ज्यादा घटिया निर्माण कर दिया गया है लोग अब यह समझने में लगे हैं कि क्या यह सड़क निर्माण है या फिर किसी प्रकार का ‘कौशल प्रदर्शन’? एक स्थानीय निवासी ने तो मजाक करते हुए कहा, "अगर दो दिन में सड़क उखड़ने का कोई अवॉर्ड मिलता, तो यह कंपनी सबसे बड़ा विजेता होती।
स्थानीय प्रशासन की चुप्पी भी इस स्थिति को और हास्यास्पद बना देती है। लगता है जैसे उन्हें भी यह सब एक मजाक लगता हो, क्योंकि न तो सड़क की गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया ?
कुल मिलाकर, इस सड़क ने साबित कर दिया  ‘जल्दबाजी’ का कोई अवॉर्ड होता, तो वह अब तक का सबसे बड़ा विजेता बन चुकी होती। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह हमारी सड़कों की 'गुणवत्ता' का असली परफॉर्मेंस है, या महज एक मजाक? आखिर विकास के नाम पर इतना बड़ा मजाक क्यों ?

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