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छतरपुर में विरोध का बदलता स्वरूप चिंताजनक,खाकी का अपमान,समाज का नुकसान

छतरपुर में बिगड़ता माहौल विरोध के नाम पर खाकी से बदसलूकी कब तक ? छतरपुर जिले का माहौल इन दिनों चिंताजनक होता जा रहा है मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला में किसी भी प्रकार का ज्ञापन सौंपना हो या विरोध प्रदर्शन करना हो,कुछ लोग अपनी सीमाएँ लांघते हुए खाकी वर्दी के साथ बदसलूकी पर उतारू हो जाते हैं।  यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि समाज की सोच पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।विरोध करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाना गलत नहीं है, लेकिन उस आवाज में संयम और मर्यादा होना भी उतना ही आवश्यक है।  पुलिसकर्मी हमारी सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं। वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं किसी के बेटे,भाई या पिता हैं। ऐसे में ज्ञापन सौंपते समय या प्रदर्शन के दौरान उनसे अभद्रता करना या खाकी पर हाथ उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। खाकी वर्दी व्यवस्था और सुरक्षा का प्रतीक है यदि हम उसी व्यवस्था को कमजोर करने लगेंगे,तो आखिर हमारी मांगें पूरी कैसे होंगी? पुलिस को प्रताड़ित कर, उन्हें उकसा कर या उन पर प्रहार कर हम अपनी ही समस्याओं ...

जब डॉक्टर बोले – हम थोड़ी इंजेक्शन लगाते हैं छतरपुर जिले के अस्पतालो में इलाज का ठेका अब सफाईकर्मियों के हवाले ?

सफाईकर्मी दे रहे इलाज स्वास्थ्य तंत्र की खुली पोल, मरीजों की जान भगवान भरोसे

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से एक बेहद चौंकाने वाली और चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। जिले के चंद्रनगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक सफाईकर्मी मरीजों को इंजेक्शन लगाता और ड्रिप चढ़ाता नजर आया। जो काम डॉक्टरों और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ का होता है, वो यहां खुलेआम एक स्वीपर कर रहा है।

इस घटना का वीडियो सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन पर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे हैरान कर देने वाली बात यह रही कि जब केंद्र में पदस्थ डॉक्टर भावना सोनी से इस लापरवाही पर सवाल किया गया, तो उन्होंने जवाब दिया – "डॉक्टर थोड़ी इंजेक्शन लगाते हैं… स्टाफ नहीं है तो कौन करेगा?

यह जवाब न सिर्फ संवेदनहीन है, बल्कि एक सरकारी डॉक्टर द्वारा दिए गए इस बयान ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवालिया निशान लगा दिया है।

डॉ. भावना यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने जिला अस्पताल का उदाहरण देते हुए कहा कि "वहां भी सफाईकर्मी इलाज करते हैं।" यानि अब ये मामला सिर्फ एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर स्थिति को उजागर कर रहा है।

ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल ये उठता है – जब डॉक्टर की जगह अनट्रेंड सफाईकर्मी इलाज करेंगे, तो मरीज की जान की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

क्या यही है वह भारत, जहां नागरिकों को स्वास्थ्य का मौलिक अधिकार मिला है ?

छतरपुर की ये तस्वीरें कोई अपवाद नहीं हैं, बल्कि उस गहराती व्यवस्था की तस्वीर हैं, जहां अस्पताल सिर्फ इमारत बनकर रह गए हैं… और इलाज जिम्मेदारी से नहीं, मजबूरी से किया जा रहा है।

अब वक्त आ गया है कि सिस्टम से सिर्फ सवाल न किए जाएं, बल्कि जवाबदेही तय हो। क्योंकि ये केवल लापरवाही नहीं… यह एक संस्थागत विफलता है।


[संवाददाता – समीर अवस्थी, छतरपुर]


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