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छतरपुर में विरोध का बदलता स्वरूप चिंताजनक,खाकी का अपमान,समाज का नुकसान

छतरपुर में बिगड़ता माहौल विरोध के नाम पर खाकी से बदसलूकी कब तक ? छतरपुर जिले का माहौल इन दिनों चिंताजनक होता जा रहा है मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला में किसी भी प्रकार का ज्ञापन सौंपना हो या विरोध प्रदर्शन करना हो,कुछ लोग अपनी सीमाएँ लांघते हुए खाकी वर्दी के साथ बदसलूकी पर उतारू हो जाते हैं।  यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि समाज की सोच पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।विरोध करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाना गलत नहीं है, लेकिन उस आवाज में संयम और मर्यादा होना भी उतना ही आवश्यक है।  पुलिसकर्मी हमारी सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं। वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं किसी के बेटे,भाई या पिता हैं। ऐसे में ज्ञापन सौंपते समय या प्रदर्शन के दौरान उनसे अभद्रता करना या खाकी पर हाथ उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। खाकी वर्दी व्यवस्था और सुरक्षा का प्रतीक है यदि हम उसी व्यवस्था को कमजोर करने लगेंगे,तो आखिर हमारी मांगें पूरी कैसे होंगी? पुलिस को प्रताड़ित कर, उन्हें उकसा कर या उन पर प्रहार कर हम अपनी ही समस्याओं ...

ज़िंदा है वो बेटी…पर अफ़सोस,न्याय की लड़ाई में अकेली है ये खबर नहीं,ज़िंदा इंसाफ़ की चीख है !


ज़िंदा है वो बेटी…पर उसकी चीख सुनने वाला कोई नहीं!

हर बार जब कोई बेटी मारी जाती है

पूरा देश जाग जाता है।

टीवी पर बहसें,सोशल मीडिया पर हैशटैग,
सड़कों पर कैंडल मार्च…हर तरफ़ “न्याय चाहिए” की आवाज़।

लेकिन जब कोई बेटी जिंदा रहकर
अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ़ खड़ी होती है…
तो उसके आसपास सिर्फ सन्नाटा होता है।

ना कोई कंधा होता है,
ना कोई सहारा,ना ही वो समाज, जो हर पोस्ट में "नारी शक्ति" की बातें करता है।


क्या इंसाफ़ पाने के लिए मरना ज़रूरी है?

कड़वा सवाल है… लेकिन इससे भी कड़वा सच ये है कि
हमारी संवेदनाएँ सिर्फ़ लाश देखकर जागती हैं।

जो बेटी आज जिंदा है,वो अकेली है…इसलिए कि उसने बोलने की हिम्मत की क्योंकि उसने चुप रहना नहीं चुना।

वो सहती रह सकती थी,खामोश रह सकती थी,
लेकिन उसने समाज की नींव को ललकार दिया।

और तब से…वो अकेली है।


चुप समाज सबसे बड़ा अपराधी है

हर उस बेटी से बड़ी गलती हम करते हैं,
जिसे सुनने के बजाय,हम उसे ही कठघरे में खड़ा कर देते हैं।

क्यों अब बोली ? क्या सबूत है?
जरूर कुछ मतलब रहा होगा…

इन सवालों से उसका शोषण करने वाला डरता नहीं…
बल्कि वो बेटी डरने लगती है,जिसने अपनी हिम्मत से सच्चाई को जगाने की कोशिश की।


क्या हमारा समाज अब सिर्फ़ मृत बेटियों से सहानुभूति रखता है?

जो बेटी जिंदा है,जिसकी आँखों में आँसू नहीं, आग है…
जो डरकर मरने के बजाय लड़ना चाहती है…
क्या वो हमारे समर्थन की हक़दार नहीं ?

जब वो चुप रहती है,तो कहते हैं – “क्यों नहीं बोली ? और जब बोलती है, तो कहते हैं – “इतना लेट क्यों ?

तो फिर बताएँ,क्या करे वो बेटी?


अब सिर्फ़ ‘बचाओ’ नहीं…साथ निभाओ’ की ज़रूरत है

बेटी को बचाने का असली मतलब तब है
जब हम उसके जीते-जी उसकी लड़ाई में उसका कंधा बनें।

क्योंकि अगर हर बार हम मरने के बाद ही लड़की का साथ देंगे,तो शायद एक दिन ऐसा आएगा
जब हर आवाज़ चुप हो जाएगी,
और फिर कोई लड़की बोलने की हिम्मत नहीं करेगी।


अब समय है उठने का…खड़े होने का…और सच का साथ देने का।

क्योंकि चुप्पी अब गुनाह है।
और सहारा बनना फर्ज़।


✍️ समीर अवस्थी

पत्रकार, छतरपुर (म.प्र.)
मैं सिर्फ़ खबर नहीं लिखता…
मैं वो लिखता हूँ जिसे लोग सुनना नहीं चाहते,
पर जिसे सुनना ज़रूरी है।


📌 नोट:
यदि ये बात आपकी आत्मा तक पहुँची हो,
तो इसे दूसरों तक पहुँचाना आपका कर्तव्य है।



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