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केन-बेतवा में मुआवजा या खेल ? सूत्रों के मुताबिक बाहरी लोगों ने भी फर्जी तरीके से लिया मुआवजा क्या अब जांच में होगी वसूली ?

केन-बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा… या फिर “मौका” वितरण ? केन बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा वितरण में विसंगतियों को लेकर चल रहे प्रदर्शन प्रशासन के आश्वासन के बाद स्थगित कर दिया गया है लेकिन मामले में अब सबकी नजर प्रशासन की जांच में टिकी हुई है  सूत्रों के अनुसार छतरपुर जिले के डूब क्षेत्र के गांवों में बड़ा फर्जीवाड़ा किया गया है जिनका हक था,वो लाइन में खड़े रह गए…और जिनका कोई लेना-देना नहीं गांव के भी नहीं ऐसे कई लोगों के खातों में पैसा पहुंच गया ये सिस्टम की गलती है या सेटिंग का कमाल ? पिछले 12 दिन तक ग्रामीण चिता पर लेटे रहे प्रदर्शन किया,तब जाकर फाइलें खुलीं और जांच दल बन गया। सवाल ये है क्या जांच सच सामने लाएगी ? अब सीधे सवाल प्रशासन से क्या फर्जी मुआवजा लेने वालों से वसूली होगी ? क्या मिलीभगत करने वाले पटवारी बच पाएंगे ? और जो असली हकदार हैं…उन्हें उनका हक मिलेगा ? या फिर हमेशा की तरह…मामला उठेगा,सुर्खियां बनेगी,और फिर सब कुछ “ठंडे बस्ते” में चला जाएगा ?

ज़िंदा है वो बेटी…पर अफ़सोस,न्याय की लड़ाई में अकेली है ये खबर नहीं,ज़िंदा इंसाफ़ की चीख है !


ज़िंदा है वो बेटी…पर उसकी चीख सुनने वाला कोई नहीं!

हर बार जब कोई बेटी मारी जाती है

पूरा देश जाग जाता है।

टीवी पर बहसें,सोशल मीडिया पर हैशटैग,
सड़कों पर कैंडल मार्च…हर तरफ़ “न्याय चाहिए” की आवाज़।

लेकिन जब कोई बेटी जिंदा रहकर
अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ़ खड़ी होती है…
तो उसके आसपास सिर्फ सन्नाटा होता है।

ना कोई कंधा होता है,
ना कोई सहारा,ना ही वो समाज, जो हर पोस्ट में "नारी शक्ति" की बातें करता है।


क्या इंसाफ़ पाने के लिए मरना ज़रूरी है?

कड़वा सवाल है… लेकिन इससे भी कड़वा सच ये है कि
हमारी संवेदनाएँ सिर्फ़ लाश देखकर जागती हैं।

जो बेटी आज जिंदा है,वो अकेली है…इसलिए कि उसने बोलने की हिम्मत की क्योंकि उसने चुप रहना नहीं चुना।

वो सहती रह सकती थी,खामोश रह सकती थी,
लेकिन उसने समाज की नींव को ललकार दिया।

और तब से…वो अकेली है।


चुप समाज सबसे बड़ा अपराधी है

हर उस बेटी से बड़ी गलती हम करते हैं,
जिसे सुनने के बजाय,हम उसे ही कठघरे में खड़ा कर देते हैं।

क्यों अब बोली ? क्या सबूत है?
जरूर कुछ मतलब रहा होगा…

इन सवालों से उसका शोषण करने वाला डरता नहीं…
बल्कि वो बेटी डरने लगती है,जिसने अपनी हिम्मत से सच्चाई को जगाने की कोशिश की।


क्या हमारा समाज अब सिर्फ़ मृत बेटियों से सहानुभूति रखता है?

जो बेटी जिंदा है,जिसकी आँखों में आँसू नहीं, आग है…
जो डरकर मरने के बजाय लड़ना चाहती है…
क्या वो हमारे समर्थन की हक़दार नहीं ?

जब वो चुप रहती है,तो कहते हैं – “क्यों नहीं बोली ? और जब बोलती है, तो कहते हैं – “इतना लेट क्यों ?

तो फिर बताएँ,क्या करे वो बेटी?


अब सिर्फ़ ‘बचाओ’ नहीं…साथ निभाओ’ की ज़रूरत है

बेटी को बचाने का असली मतलब तब है
जब हम उसके जीते-जी उसकी लड़ाई में उसका कंधा बनें।

क्योंकि अगर हर बार हम मरने के बाद ही लड़की का साथ देंगे,तो शायद एक दिन ऐसा आएगा
जब हर आवाज़ चुप हो जाएगी,
और फिर कोई लड़की बोलने की हिम्मत नहीं करेगी।


अब समय है उठने का…खड़े होने का…और सच का साथ देने का।

क्योंकि चुप्पी अब गुनाह है।
और सहारा बनना फर्ज़।


✍️ समीर अवस्थी

पत्रकार, छतरपुर (म.प्र.)
मैं सिर्फ़ खबर नहीं लिखता…
मैं वो लिखता हूँ जिसे लोग सुनना नहीं चाहते,
पर जिसे सुनना ज़रूरी है।


📌 नोट:
यदि ये बात आपकी आत्मा तक पहुँची हो,
तो इसे दूसरों तक पहुँचाना आपका कर्तव्य है।



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