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क्या मेंढकों की आवाज़ सुनाने के लिए काटी जा रही है बिजली ?

टर्र-टर्र के बीच अंधेरे में जनता,आखिर बिजली विभाग कब जागेगा ? समीर अवस्थी बरसात का मौसम आते ही गांव-गांव में मेंढकों की टर्र-टर्र सुनाई देने लगी है। कहीं लोक परंपरा के तहत मेंढक-मेंढकी का विवाह कराया जा रहा है, तो कहीं अच्छी बारिश की कामना में लोग पूजा-पाठ कर रहे हैं। आस्था और परंपरा भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं, उनका सम्मान होना चाहिए। लेकिन इन सबके बीच एक और परंपरा ऐसी है जो हर साल निभाई जाती है अघोषित बिजली कटौती छतरपुर के बमीठा क्षेत्र में बिजली गायब है क्षेत्र के कई  गांव अंधेरे में डूबा हुआ है। लोग मज़ाक में कह रहे हैं कि शायद बिजली विभाग ने भी सोचा होगा कि जब मेंढकों की बारात निकल रही है तो लाइट बंद कर दो,ताकि जनता प्रकृति का संगीत पूरे सुकून से सुन सके। यह लेख भले ही हंसी पैदा करे,लेकिन इसके पीछे जनता की गहरी पीड़ा छिपी है आखिर सवाल यह है कि जब आधुनिक भारत,डिजिटल इंडिया और स्मार्ट व्यवस्था की बातें हो रही हैं,तब ग्रामीण क्षेत्रों में घंटों अघोषित बिजली कटौती क्यों? यदि लाइन में तकनीकी खराबी है तो उसकी सूचना क्यों नहीं? यदि रखरखाव का कार्य है तो उसका समय पहले से...

6 महीने से खाली है खजुराहो SDOP की कुर्सी – क्या कोई खास मंजूरी बाकी है ?

खजुराहो को 'संवेदनशील' माना गया...लेकिन अफसर की कुर्सी 6 महीने से खाली! आखिर क्यों?

विश्व प्रसिद्ध खजुराहो नगरी, जहां हर साल हजारों सैलानी आते हैं, जहां वीवीआईपी मूवमेंट आम बात है, वहां बीते 6 महीने से अनुविभागीय पुलिस अधिकारी (SDOP) की कुर्सी खाली पड़ी है। सवाल ये है कि ये चुप्पी आखिर किस साजिश की गूंज है?

> संवेदनशील क्षेत्र है साहब!
> यही कहा जाता है जब सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। लेकिन जब बात अफसर की तैनाती की आती है, तो जिम्मेदार ‘संवेदनशीलता’ भूल जाते हैं। क्या खजुराहो अब खुद ही खुद को संभाले?

> पर्यटन नगरी है, विदेश से मेहमान आते हैं।
> लेकिन लगता है शासन को भरोसा है – विदेशी सैलानी खुद अपनी सुरक्षा कर लेंगे, क्योंकि प्रशासन तो फिलहाल 'स्थापना प्रक्रिया' में ही उलझा है।

> वीवीआईपी मूवमेंट है, बड़ी जगह है।
> मगर अधिकारी की नियुक्ति? वो तो मानो ‘राजनीतिक मोहर’ के इंतजार में है। क्या खजुराहो की कुर्सी किसी 'सियासी सौदे' का हिस्सा बन चुकी है?

> 6 महीने से कुर्सी खाली है, जिम्मेदार कौन ?
> या फिर सवाल ही गलत है? जिम्मेदार तो वही होंगे जो फाइल दबाकर बैठे हैं, और जनता जवाब चाहती है – 'क्या किसी की मर्जी का इंतजार है?' या फिर खजुराहो को वाकई में भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है?

खजुराहो के लोगों का सवाल बिल्कुल सीधा है ?

> क्या कोई ऐसा भी अफसर नहीं मिला, जो इस ऐतिहासिक शहर की ज़िम्मेदारी उठा सके?
> या फिर जवाब यही है – यह पद भी राजनीति की मोहर से तय होता है ?

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