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छतरपुर में विरोध का बदलता स्वरूप चिंताजनक,खाकी का अपमान,समाज का नुकसान

छतरपुर में बिगड़ता माहौल विरोध के नाम पर खाकी से बदसलूकी कब तक ? छतरपुर जिले का माहौल इन दिनों चिंताजनक होता जा रहा है मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला में किसी भी प्रकार का ज्ञापन सौंपना हो या विरोध प्रदर्शन करना हो,कुछ लोग अपनी सीमाएँ लांघते हुए खाकी वर्दी के साथ बदसलूकी पर उतारू हो जाते हैं।  यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि समाज की सोच पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।विरोध करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाना गलत नहीं है, लेकिन उस आवाज में संयम और मर्यादा होना भी उतना ही आवश्यक है।  पुलिसकर्मी हमारी सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं। वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं किसी के बेटे,भाई या पिता हैं। ऐसे में ज्ञापन सौंपते समय या प्रदर्शन के दौरान उनसे अभद्रता करना या खाकी पर हाथ उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। खाकी वर्दी व्यवस्था और सुरक्षा का प्रतीक है यदि हम उसी व्यवस्था को कमजोर करने लगेंगे,तो आखिर हमारी मांगें पूरी कैसे होंगी? पुलिस को प्रताड़ित कर, उन्हें उकसा कर या उन पर प्रहार कर हम अपनी ही समस्याओं ...

6 महीने से खाली है खजुराहो SDOP की कुर्सी – क्या कोई खास मंजूरी बाकी है ?

खजुराहो को 'संवेदनशील' माना गया...लेकिन अफसर की कुर्सी 6 महीने से खाली! आखिर क्यों?

विश्व प्रसिद्ध खजुराहो नगरी, जहां हर साल हजारों सैलानी आते हैं, जहां वीवीआईपी मूवमेंट आम बात है, वहां बीते 6 महीने से अनुविभागीय पुलिस अधिकारी (SDOP) की कुर्सी खाली पड़ी है। सवाल ये है कि ये चुप्पी आखिर किस साजिश की गूंज है?

> संवेदनशील क्षेत्र है साहब!
> यही कहा जाता है जब सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। लेकिन जब बात अफसर की तैनाती की आती है, तो जिम्मेदार ‘संवेदनशीलता’ भूल जाते हैं। क्या खजुराहो अब खुद ही खुद को संभाले?

> पर्यटन नगरी है, विदेश से मेहमान आते हैं।
> लेकिन लगता है शासन को भरोसा है – विदेशी सैलानी खुद अपनी सुरक्षा कर लेंगे, क्योंकि प्रशासन तो फिलहाल 'स्थापना प्रक्रिया' में ही उलझा है।

> वीवीआईपी मूवमेंट है, बड़ी जगह है।
> मगर अधिकारी की नियुक्ति? वो तो मानो ‘राजनीतिक मोहर’ के इंतजार में है। क्या खजुराहो की कुर्सी किसी 'सियासी सौदे' का हिस्सा बन चुकी है?

> 6 महीने से कुर्सी खाली है, जिम्मेदार कौन ?
> या फिर सवाल ही गलत है? जिम्मेदार तो वही होंगे जो फाइल दबाकर बैठे हैं, और जनता जवाब चाहती है – 'क्या किसी की मर्जी का इंतजार है?' या फिर खजुराहो को वाकई में भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है?

खजुराहो के लोगों का सवाल बिल्कुल सीधा है ?

> क्या कोई ऐसा भी अफसर नहीं मिला, जो इस ऐतिहासिक शहर की ज़िम्मेदारी उठा सके?
> या फिर जवाब यही है – यह पद भी राजनीति की मोहर से तय होता है ?

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