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मैं खजुराहो मुझे बचाओ - मंदिरों की नगरी में नशे का साया जिम्मेदार बेखबर ?

खजुराहो के वेस्टर्न ग्रुप ऑफ टेंपल के मुख्य द्वार के पास शराब ठेका,चंदेलकालीन शिवसागर तालाब बना शराबियों का अड्डा जिम्मेदार बेखबर  खजुराहो केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और विश्व मंच पर देश की ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। यहां स्थित खजुराहो मंदिर समूह को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है और हर साल देश-विदेश से हजारों पर्यटक इसकी अद्भुत स्थापत्य कला और इतिहास को देखने पहुंचते हैं। विशेष रूप से वेस्टर्न ग्रुप ऑफ टेंपल खजुराहो का सबसे प्रमुख और सर्वाधिक भ्रमण किया जाने वाला परिसर है। लेकिन इन दिनों जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे खजुराहो की प्रतिष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। वेस्टर्न ग्रुप ऑफ टेंपल के मुख्य प्रवेश द्वार के पास संचालित शराब ठेके से शराब खरीदकर कुछ लोग पास स्थित चंदेलकालीन शिवसागर तालाब में बैठकर खुलेआम शराब पीते दिखाई दे रहे हैं। तालाब के किनारों पर बिखरी शराब की बोतलें और गंदगी न केवल ऐतिहासिक धरोहर की गरिमा को ठेस पहुंचा रही हैं, बल्कि आने वाले पर्यटकों के सामने भी खजुराहो की नकारात्मक छवि प्रस्तुत कर रही हैं। खजुराहो की प...

6 महीने से खाली है खजुराहो SDOP की कुर्सी – क्या कोई खास मंजूरी बाकी है ?

खजुराहो को 'संवेदनशील' माना गया...लेकिन अफसर की कुर्सी 6 महीने से खाली! आखिर क्यों?

विश्व प्रसिद्ध खजुराहो नगरी, जहां हर साल हजारों सैलानी आते हैं, जहां वीवीआईपी मूवमेंट आम बात है, वहां बीते 6 महीने से अनुविभागीय पुलिस अधिकारी (SDOP) की कुर्सी खाली पड़ी है। सवाल ये है कि ये चुप्पी आखिर किस साजिश की गूंज है?

> संवेदनशील क्षेत्र है साहब!
> यही कहा जाता है जब सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। लेकिन जब बात अफसर की तैनाती की आती है, तो जिम्मेदार ‘संवेदनशीलता’ भूल जाते हैं। क्या खजुराहो अब खुद ही खुद को संभाले?

> पर्यटन नगरी है, विदेश से मेहमान आते हैं।
> लेकिन लगता है शासन को भरोसा है – विदेशी सैलानी खुद अपनी सुरक्षा कर लेंगे, क्योंकि प्रशासन तो फिलहाल 'स्थापना प्रक्रिया' में ही उलझा है।

> वीवीआईपी मूवमेंट है, बड़ी जगह है।
> मगर अधिकारी की नियुक्ति? वो तो मानो ‘राजनीतिक मोहर’ के इंतजार में है। क्या खजुराहो की कुर्सी किसी 'सियासी सौदे' का हिस्सा बन चुकी है?

> 6 महीने से कुर्सी खाली है, जिम्मेदार कौन ?
> या फिर सवाल ही गलत है? जिम्मेदार तो वही होंगे जो फाइल दबाकर बैठे हैं, और जनता जवाब चाहती है – 'क्या किसी की मर्जी का इंतजार है?' या फिर खजुराहो को वाकई में भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है?

खजुराहो के लोगों का सवाल बिल्कुल सीधा है ?

> क्या कोई ऐसा भी अफसर नहीं मिला, जो इस ऐतिहासिक शहर की ज़िम्मेदारी उठा सके?
> या फिर जवाब यही है – यह पद भी राजनीति की मोहर से तय होता है ?

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