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जो साथ है वो तेरा, बाकी सब मोह का फेरा...See more
लेखक: पत्रकार समीर अवस्थी
समय की रफ्तार तेज़ है... इतनी तेज़ कि कब कौन साथ छूट गया, पता ही नहीं चलता। जिंदगी की इस दौड़ में हम हर किसी को साथ लेकर चलना चाहते हैं — रिश्तेदार, दोस्त, सहयोगी, परिचित... और कई बार तो ऐसे लोग भी जिनसे सिर्फ औपचारिकता भर का नाता होता है।
लेकिन जब ज़िंदगी किसी मोड़ पर ठहरती है — किसी कठिन परिस्थिति में, किसी अकेलेपन में, किसी असली इम्तहान में — तब समझ आता है कि साथ तो बहुतों का था, पर सच्चा साथ सिर्फ उसी का था, जो बिना कहे तुम्हारे दर्द को समझ गया।
"जो साथ है वो तेरा, बाकी सब मोह का फेरा" — यह पंक्ति सिर्फ शब्द नहीं, एक अनुभव है, एक दर्शन है। यह हमें बताती है कि संबंधों की भीड़ में सिर्फ वही लोग मूल्यवान हैं जो नीयत से जुड़े हों, न कि नीयत का दिखावा करने वाले।
मैंने खुद पत्रकारिता के सफर में सैकड़ों चेहरों को करीब से देखा है। बड़े नेता, अभिनेता, समाजसेवी, और आम जनता... सबके चेहरे पर एक मुस्कान होती है, पर सबके पीछे की सच्चाई अलग। जितना मैंने देखा, समझा और जिया — उतना साफ़ हो गया कि इंसान का सबसे बड़ा धोखा उसकी उम्मीदें होती हैं। वो उम्मीदें, जो वह हर किसी से रख बैठता है, बिना यह समझे कि सामने वाला साथ निभाने आया है या सिर्फ वक्त काटने।
कई बार हमारे अपने कहे जाने वाले लोग ही हमें सबसे ज़्यादा तकलीफ़ दे जाते हैं, और कई बार एक अनजान इंसान भी हमारे घावों पर मरहम बन जाता है। यही है जीवन का सबसे बड़ा सत्य — साथ वही सच्चा जो वक्त पर खड़ा रहे, बाकी सब मोह की उस दुनिया का हिस्सा हैं जो दिखती बहुत चमकदार है, पर छूने पर खोखली लगती है।
आज जब आप अपने आसपास के रिश्तों को देखें, तो ठहरकर सोचिए — कौन है जो आपकी खामोशी में भी आपके मन की बात समझता है? कौन है जो आपकी असफलताओं में भी आपको थामे रहता है? वही है... "जो साथ है वो तेरा"। बाकी सब... बस "मोह का फेरा" हैं, जो समय आने पर खुद-ब-खुद छँट जाते हैं।
इस लेख के अंत में मैं बस इतना कहूँगा —
रिश्तों की भीड़ में खुद को मत खोइए,
जो दिल से साथ हैं, बस उन्हें अपनाइए।
बाकी सब कुछ छोड़ दीजिए... मोह समझ कर।
– पत्रकार समीर अवस्थी
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