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वाह रे नेशनल मीडिया... ABP News

जब देश में किसान आत्महत्या कर रहा हो,बेरोजगार डिग्री लेकर दर-दर भटक रहा हो, गांवों में सड़क, पानी और अस्पताल की हालत बदतर हो,पुलिस थानों में स्टाफ की कमी हो,छोटे शहरों में भ्रष्टाचार चरम पर हो,तब नेशनल मीडिया को सबसे बड़ी चिंता ये है कि कॉन्डम बनाने का कच्चा माल नहीं आ रहा ? वाह रे नेशनल मीडिया... देश में महंगाई से जनता का “दम” निकल रहा है, लेकिन टीवी पर बहस इस बात की चल रही है कि “रबर” कैसे बचेगा। किसान की फसल जल जाए,मजदूर का घर टूट जाए, युवाओं को नौकरी न मिले, गांव में एम्बुलेंस समय पर न पहुंचे, इन खबरों में शायद टीआरपी नहीं है। लेकिन अगर मिडिल ईस्ट युद्ध से कॉन्डम की सप्लाई पर असर पड़ जाए,तो स्टूडियो में ऐसे हंगामा होता है जैसे देश की सीमाएं खतरे में आ गई हों। अब शायद अगली ब्रेकिंग यही होगी.... देश संकट में,रोमांस पर मंडराया खतरा मिडिल ईस्ट युद्ध से रिश्तों में आई मंदी कच्चे माल की कमी से प्यार पर पड़ा असर सवाल यह नहीं कि खबर दिखाई क्यों गई... सवाल यह है कि क्या देश में दिखाने के लिए इससे बड़ा कोई मुद्दा बचा ही नहीं है ? नेशनल मीडिया अब खबर नहीं दिखा रहा,लोगों का ध्यान भ...

एंबुलेंस नहीं मिली,ई-रिक्शा में ऑक्सीजन सिलेंडर लगाकर जाना पड़ा मरीज को घर खजुराहो हाईवे पर कैमरे में कैद हुई दर्दनाक तस्वीरें इलाज के अभाव में हुई मौत

छतरपुर जिले की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था फिर सवालों के घेरे में, वायरल वीडियो के बाद खुली पोल, परिजनों ने लगाए गंभीर आरोप

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की लचर स्थिति ने एक और गरीब की जान ले ली। एंबुलेंस न मिलने के कारण हलकन अहिरवार नामक मरीज को ई-रिक्शा में ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ घर लाना पड़ा जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अब शासन-प्रशासन सवालों के घेरे में आ गया है।

परिजनों के अनुसार हलकन अहिरवार पिछले चार–पांच महीनों से बीमार थे। उन्हें सांस लेने में गंभीर समस्या थी और उनका एक फेफड़ा खराब हो गया था उन्हें 25 सितंबर को छतरपुर जिला अस्पताल से ग्वालियर रेफर किया गया था इस दौरान परिजनों को न केवल कई बार निजी एंबुलेंस का सहारा लेना पड़ा, बल्कि महंगे दवाइयों और उपकरणों का खर्च भी खुद उठाना पड़ा।

मृतक की बेटी केशकली अहिरवार ने बताया कि आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद अस्पताल में सिर्फ कुछ ही दवाएं मिलीं, बाकी सब कुछ मेडिकल स्टोर से खरीदना पड़ा। उन्होंने बताया कि:

  • ₹5,000 में दो ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदे

  • ₹300-₹250 प्रतिदिन सिलेंडर भरवाने का खर्च

  • ₹1,200 ई-रिक्शा में लाने-ले जाने में

  • ₹1,200 रेगुलेटर की खरीदारी

  • ग्वालियर से लौटते वक्त ₹7,000 प्राइवेट एंबुलेंस में लगे

उन्होंने यह भी कहा कि दो महीने से मजदूरी बंद है और अब तक इलाज पर लगभग ₹1.5 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं।

डॉक्टरों और प्रशासन पर आरोप

केशकली का कहना है कि जब मरीज की हालत ज्यादा बिगड़ी, तो छतरपुर जिला अस्पताल में भर्ती करने से मना कर दिया गया और ग्वालियर रेफर किया गया जहां दो दिन बाद डॉक्टरों ने इलाज से इंकार कर दिया वो ग्वालियर से प्राइवेट एम्बुलेंस से छतरपुर जिले के राजनगर थाना क्षेत्र पाय गांव अपने घर लेकर आई अचानक मंगलवार को तबियत बिगड़ी तो एम्बुलेंस नहीं मिल सका और ई रिक्शा से बमीठा के एक प्राइवेट डॉक्टर को दिखाने गई थी जिसका लौटते वक्त खजुराहो में वीडियो कैमरे में कैद हुआ

ग्राम पंचायत पाए के सरपंच प्रतिनिधि नर्मद पटेल ने भी माना कि हलकन अहिरवार की मौत एंबुलेंस न मिलने और इलाज में देरी की वजह से हुई है। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे शासन से पीड़ित परिवार को आर्थिक मदद दिलाने का प्रयास करेंगे।

परिजनों की मांग और नाराज़गी

मृतक के भतीजे कैलाश अहिरवार ने भी आरोप लगाया कि सरकारी एंबुलेंस सेवा सिर्फ एक बार उपलब्ध करवाई जाती है, उसके बाद मदद नहीं मिलती। अस्पताल में पहले ऑक्सीजन दी गई, लेकिन बाद में देने से मना कर दिया गया। मजबूरी में परिवार को निजी सिलेंडर का इंतज़ाम करना पड़ा।

परिजनों का कहना है कि सरकार की योजनाएं केवल कागज़ों पर हैं और असली लाभ गरीबों तक नहीं पहुंचता। इलाज के नाम पर डॉक्टर और अस्पताल कर्मी ही अधिकतर लाभ उठा लेते हैं।

हलकन अहिरवार की मौत ने छतरपुर जिले की स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। वायरल वीडियो और परिजनों के आरोपों के बावजूद अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। सवाल यह है कि जब सरकारी योजनाएं ज़रूरतमंदों तक नहीं पहुंचतीं, तो आम जनता का भरोसा किस पर टिकेगा?

खर्च का ब्योरा:

  • सिलेंडर: ₹5,000

  • रोज़ाना रिफिलिंग: ₹300/₹250

  • रेगुलेटर: ₹1,200

  • रिक्शा: ₹1,200

  • प्राइवेट एंबुलेंस: ₹7,000

  • कुल अनुमानित खर्च: ₹1.5 लाख

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