Skip to main content

BREAKING NEWS

बिजली सप्लाई ठप्प मची हाहाकार 12 घंटे से बिजली गुल,पानी संकट भी गहराया

12 घंटे से ठप बिजली सप्लाई,गर्मी और पानी संकट से जूझ रहे ग्रामीण छतरपुर,समीर अवस्थी छतरपुर जिले के बमीठा क्षेत्र में बिजली संकट लगातार गहराता जा रहा है। क्षेत्र में 12 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बिजली आपूर्ति बहाल नहीं हो सकी है, जिससे आमजन का जनजीवन प्रभावित हो गया है। भीषण गर्मी के बीच बिजली गुल होने से लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय नागरिकों के अनुसार रात से बंद हुई बिजली अब तक नहीं आई है। बिजली नहीं होने के कारण घरों में लगे पंखे, कूलर और अन्य आवश्यक उपकरण बंद पड़े हैं। गर्मी और उमस के कारण छोटे बच्चों, बुजुर्गों एवं मरीजों की स्थिति सबसे अधिक प्रभावित हो रही है। बिजली कटौती का असर पेयजल व्यवस्था पर भी देखने को मिल रहा है। कई स्थानों पर मोटर और पंप नहीं चल पाने से लोगों को पानी की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और अधिक गंभीर बनी हुई है, जहां लोग पानी भरने के लिए दूर-दूर तक जाने को मजबूर हैं। जानकारी के अनुसार हाल ही में आए तेज आंधी-तूफान और बारिश के कारण कई स्थानों पर बिजली लाइनें एवं खंभे क्षतिग्रस्त ह...

गरीब के हिस्से का उजाला किसने छीन लिया ? दिवाली की रौशनी में दबे गरीबों के अधिकार

दीयों की रौशनी में गुम अंधेरे: गरीबों की दिवाली
त्योहारों का मौसम है। बाज़ार सजे हैं, घरों में रंग-बिरंगे दीये जलाए जा रहे हैं, मिठाइयों की खुशबू हवाओं में घुली है। सोशल मीडिया पर तस्वीरें हैं, रोशनी है, उत्साह है। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे कुछ सवाल हैं जो अक्सर अंधेरे में छिप जाते हैं।

क्या हर घर में सच में दिवाली है?

सरकार की योजनाओं का लाभ, सबके लिए घोषित होता है  लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। जब नीतियाँ बनती हैं, तो अक्सर लाभ उन्हीं तक पहुँचता है जिनके पास पहले से बहुत कुछ है। जिनके पास बड़ी कोठियाँ हैं, उनके आंगन और भी रौशन हो जाते हैं। लेकिन जिन गरीबों के हक़ की ज़मीन, उनका घर, उनकी रोज़ी नीतियों की आड़ में छीन ली जाती है उनके लिए दीवाली एक खाली सपना बनकर रह जाती है।

उनके घरों में भी एक दीया जलता है  मगर वह दीया रौशनी का नहीं, बेबसी का होता है।

आज जब हम अपने घरों को रौशन करते हैं, क्या हमने सोचा है उन चेहरों के बारे में जो अंधेरे में रह गए? जिनके हिस्से की रौशनी किसी और के आंगन को जगमगा रही है?

सरकारी आँकड़ों में तो सब कुछ “सबके लिए” होता है, मगर जमीनी सच्चाई में गरीब को अक्सर लाइन से बाहर कर दिया जाता है। हक़ के नाम पर सिर्फ़ वादे मिलते हैं, और हक़ीक़त में इंतज़ार  सालों साल का।

दिवाली के दीयों से पहले ज़रूरत है उन नीतियों को रौशन करने की, जो गरीबों के जीवन में सचमुच उजाला ला सकें। त्योहार तब ही सार्थक होंगे जब सबके चेहरे पर मुस्कान होगी न कि कुछ चेहरों पर रौशनी और बाकी पर स्याह अंधेरा। इस दिवाली, सिर्फ़ दीये मत जलाइए, एक आवाज़ बनिए  हक़ के लिए, बराबरी के लिए, इंसानियत के लिए।

Comments