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छतरपुर में विरोध का बदलता स्वरूप चिंताजनक,खाकी का अपमान,समाज का नुकसान

छतरपुर में बिगड़ता माहौल विरोध के नाम पर खाकी से बदसलूकी कब तक ? छतरपुर जिले का माहौल इन दिनों चिंताजनक होता जा रहा है मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला में किसी भी प्रकार का ज्ञापन सौंपना हो या विरोध प्रदर्शन करना हो,कुछ लोग अपनी सीमाएँ लांघते हुए खाकी वर्दी के साथ बदसलूकी पर उतारू हो जाते हैं।  यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि समाज की सोच पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।विरोध करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाना गलत नहीं है, लेकिन उस आवाज में संयम और मर्यादा होना भी उतना ही आवश्यक है।  पुलिसकर्मी हमारी सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं। वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं किसी के बेटे,भाई या पिता हैं। ऐसे में ज्ञापन सौंपते समय या प्रदर्शन के दौरान उनसे अभद्रता करना या खाकी पर हाथ उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। खाकी वर्दी व्यवस्था और सुरक्षा का प्रतीक है यदि हम उसी व्यवस्था को कमजोर करने लगेंगे,तो आखिर हमारी मांगें पूरी कैसे होंगी? पुलिस को प्रताड़ित कर, उन्हें उकसा कर या उन पर प्रहार कर हम अपनी ही समस्याओं ...

गरीब के हिस्से का उजाला किसने छीन लिया ? दिवाली की रौशनी में दबे गरीबों के अधिकार

दीयों की रौशनी में गुम अंधेरे: गरीबों की दिवाली
त्योहारों का मौसम है। बाज़ार सजे हैं, घरों में रंग-बिरंगे दीये जलाए जा रहे हैं, मिठाइयों की खुशबू हवाओं में घुली है। सोशल मीडिया पर तस्वीरें हैं, रोशनी है, उत्साह है। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे कुछ सवाल हैं जो अक्सर अंधेरे में छिप जाते हैं।

क्या हर घर में सच में दिवाली है?

सरकार की योजनाओं का लाभ, सबके लिए घोषित होता है  लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। जब नीतियाँ बनती हैं, तो अक्सर लाभ उन्हीं तक पहुँचता है जिनके पास पहले से बहुत कुछ है। जिनके पास बड़ी कोठियाँ हैं, उनके आंगन और भी रौशन हो जाते हैं। लेकिन जिन गरीबों के हक़ की ज़मीन, उनका घर, उनकी रोज़ी नीतियों की आड़ में छीन ली जाती है उनके लिए दीवाली एक खाली सपना बनकर रह जाती है।

उनके घरों में भी एक दीया जलता है  मगर वह दीया रौशनी का नहीं, बेबसी का होता है।

आज जब हम अपने घरों को रौशन करते हैं, क्या हमने सोचा है उन चेहरों के बारे में जो अंधेरे में रह गए? जिनके हिस्से की रौशनी किसी और के आंगन को जगमगा रही है?

सरकारी आँकड़ों में तो सब कुछ “सबके लिए” होता है, मगर जमीनी सच्चाई में गरीब को अक्सर लाइन से बाहर कर दिया जाता है। हक़ के नाम पर सिर्फ़ वादे मिलते हैं, और हक़ीक़त में इंतज़ार  सालों साल का।

दिवाली के दीयों से पहले ज़रूरत है उन नीतियों को रौशन करने की, जो गरीबों के जीवन में सचमुच उजाला ला सकें। त्योहार तब ही सार्थक होंगे जब सबके चेहरे पर मुस्कान होगी न कि कुछ चेहरों पर रौशनी और बाकी पर स्याह अंधेरा। इस दिवाली, सिर्फ़ दीये मत जलाइए, एक आवाज़ बनिए  हक़ के लिए, बराबरी के लिए, इंसानियत के लिए।

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