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वाह रे नेशनल मीडिया... ABP News

जब देश में किसान आत्महत्या कर रहा हो,बेरोजगार डिग्री लेकर दर-दर भटक रहा हो, गांवों में सड़क, पानी और अस्पताल की हालत बदतर हो,पुलिस थानों में स्टाफ की कमी हो,छोटे शहरों में भ्रष्टाचार चरम पर हो,तब नेशनल मीडिया को सबसे बड़ी चिंता ये है कि कॉन्डम बनाने का कच्चा माल नहीं आ रहा ? वाह रे नेशनल मीडिया... देश में महंगाई से जनता का “दम” निकल रहा है, लेकिन टीवी पर बहस इस बात की चल रही है कि “रबर” कैसे बचेगा। किसान की फसल जल जाए,मजदूर का घर टूट जाए, युवाओं को नौकरी न मिले, गांव में एम्बुलेंस समय पर न पहुंचे, इन खबरों में शायद टीआरपी नहीं है। लेकिन अगर मिडिल ईस्ट युद्ध से कॉन्डम की सप्लाई पर असर पड़ जाए,तो स्टूडियो में ऐसे हंगामा होता है जैसे देश की सीमाएं खतरे में आ गई हों। अब शायद अगली ब्रेकिंग यही होगी.... देश संकट में,रोमांस पर मंडराया खतरा मिडिल ईस्ट युद्ध से रिश्तों में आई मंदी कच्चे माल की कमी से प्यार पर पड़ा असर सवाल यह नहीं कि खबर दिखाई क्यों गई... सवाल यह है कि क्या देश में दिखाने के लिए इससे बड़ा कोई मुद्दा बचा ही नहीं है ? नेशनल मीडिया अब खबर नहीं दिखा रहा,लोगों का ध्यान भ...

गरीब के हिस्से का उजाला किसने छीन लिया ? दिवाली की रौशनी में दबे गरीबों के अधिकार

दीयों की रौशनी में गुम अंधेरे: गरीबों की दिवाली
त्योहारों का मौसम है। बाज़ार सजे हैं, घरों में रंग-बिरंगे दीये जलाए जा रहे हैं, मिठाइयों की खुशबू हवाओं में घुली है। सोशल मीडिया पर तस्वीरें हैं, रोशनी है, उत्साह है। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे कुछ सवाल हैं जो अक्सर अंधेरे में छिप जाते हैं।

क्या हर घर में सच में दिवाली है?

सरकार की योजनाओं का लाभ, सबके लिए घोषित होता है  लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। जब नीतियाँ बनती हैं, तो अक्सर लाभ उन्हीं तक पहुँचता है जिनके पास पहले से बहुत कुछ है। जिनके पास बड़ी कोठियाँ हैं, उनके आंगन और भी रौशन हो जाते हैं। लेकिन जिन गरीबों के हक़ की ज़मीन, उनका घर, उनकी रोज़ी नीतियों की आड़ में छीन ली जाती है उनके लिए दीवाली एक खाली सपना बनकर रह जाती है।

उनके घरों में भी एक दीया जलता है  मगर वह दीया रौशनी का नहीं, बेबसी का होता है।

आज जब हम अपने घरों को रौशन करते हैं, क्या हमने सोचा है उन चेहरों के बारे में जो अंधेरे में रह गए? जिनके हिस्से की रौशनी किसी और के आंगन को जगमगा रही है?

सरकारी आँकड़ों में तो सब कुछ “सबके लिए” होता है, मगर जमीनी सच्चाई में गरीब को अक्सर लाइन से बाहर कर दिया जाता है। हक़ के नाम पर सिर्फ़ वादे मिलते हैं, और हक़ीक़त में इंतज़ार  सालों साल का।

दिवाली के दीयों से पहले ज़रूरत है उन नीतियों को रौशन करने की, जो गरीबों के जीवन में सचमुच उजाला ला सकें। त्योहार तब ही सार्थक होंगे जब सबके चेहरे पर मुस्कान होगी न कि कुछ चेहरों पर रौशनी और बाकी पर स्याह अंधेरा। इस दिवाली, सिर्फ़ दीये मत जलाइए, एक आवाज़ बनिए  हक़ के लिए, बराबरी के लिए, इंसानियत के लिए।

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