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क्या मेंढकों की आवाज़ सुनाने के लिए काटी जा रही है बिजली ?

टर्र-टर्र के बीच अंधेरे में जनता,आखिर बिजली विभाग कब जागेगा ? समीर अवस्थी बरसात का मौसम आते ही गांव-गांव में मेंढकों की टर्र-टर्र सुनाई देने लगी है। कहीं लोक परंपरा के तहत मेंढक-मेंढकी का विवाह कराया जा रहा है, तो कहीं अच्छी बारिश की कामना में लोग पूजा-पाठ कर रहे हैं। आस्था और परंपरा भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं, उनका सम्मान होना चाहिए। लेकिन इन सबके बीच एक और परंपरा ऐसी है जो हर साल निभाई जाती है अघोषित बिजली कटौती छतरपुर के बमीठा क्षेत्र में बिजली गायब है क्षेत्र के कई  गांव अंधेरे में डूबा हुआ है। लोग मज़ाक में कह रहे हैं कि शायद बिजली विभाग ने भी सोचा होगा कि जब मेंढकों की बारात निकल रही है तो लाइट बंद कर दो,ताकि जनता प्रकृति का संगीत पूरे सुकून से सुन सके। यह लेख भले ही हंसी पैदा करे,लेकिन इसके पीछे जनता की गहरी पीड़ा छिपी है आखिर सवाल यह है कि जब आधुनिक भारत,डिजिटल इंडिया और स्मार्ट व्यवस्था की बातें हो रही हैं,तब ग्रामीण क्षेत्रों में घंटों अघोषित बिजली कटौती क्यों? यदि लाइन में तकनीकी खराबी है तो उसकी सूचना क्यों नहीं? यदि रखरखाव का कार्य है तो उसका समय पहले से...

मदर्स डे स्पेशल स्टोरी - एक तरफ सरकारी नॉकरी का कर्तव्य तो दूसरी ओर माँ होने का फर्ज निभा रही हैं सुनिता रणदिवे

किसी ने सच ही कहा है कि भगवान हर जगह मौजूद नहीं रह सकते इसलिए उन्होंने मां को बनाया है. मां भगवान का बनाया गया सबसे नायाब तोहफा है यह दिन सभी मांओं को समर्पित होता है हर व्यक्ति के जीवन में मां वो महिला होती है जिससे वो अपने मन की सभी बाते शेयर करते हैं. और अगर मां की बात करें तो उसका बच्चा दुनिया वालों के लिए कितना भी बुरा क्यों ना हो उसे वह सबसे प्यारा होता है शायद इसलिए मां की ममता को शायद कोई नहीं समझ सकता  
आज मदर्स डे है और हम बात कर रहे है सुनीता रणदिवे की जो जबलपुर के चरगवां क्षेत्र के बिजौरी उप स्वास्थ्य केन्द्र में कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर के पद पर पदस्थ है इन दिनों सुनीता अपने 10 माह के बच्चे को लेकर बखूबी अपनी सरकारी नॉकरी का कर्तव्य ओर दूसरी ओर माँ होने का फर्ज दोनों निभा रही हैं।सुनीता ने बताया कि उनका जन्म बालाघाट के लांजी में हुआ था। जहाँ गरीब परस्थितियों पढ़ाई करने के बाद अनेकों जगह इंटरव्यू एग्जाम दिए लेकिन नॉकरी नही लगी। लेकिन इसके बाद भी सुनीता हार नही मानी।ओर 2011 में किस्मत की लॉटरी आखिर खुल ही गई। जंहा पहली पोस्टिंग उमरिया जिले की जिला अस्पताल में नर्स के पद पर पदस्थ हुई थी। नॉकरी लगने के कुछ महीने बाद ही सुनीता की शादी मेडिकल कॉलेज जबलपुर सेंट्रल लेब में पदस्थ सुरेश रणदिवे के साथ हुई। वही पांच साल वीत जाने के बाद सुनीता का ट्रांसफर जबलपुर के चरगवां स्वास्थ्य में हो गया इसके बाद शहर के अन्य जगह सेवाए दी है विगत चार माह से सुनीता चरगवां के बिजौरी उप स्वास्थ्य केंद्र में सेवाए दे रही है।वही सुनीता के दो बच्चे है पहला बच्चा चार साल का ओर वहीं दूसरा बच्चा 10 माह का है जो के बिजौरी में माँ के साथ ही रहता है कोरोना इस आपदा की घड़ी में लोग परेशान ना हो उन्हें उचित इलाज मिले इसलिए महिला डॉक्टर पूरी ईमानदारी कर कर्तव्यनिष्ठा से दिन रात अस्पताल में रहकर अपनी ड्यूटी कर रही है महिला
डॉ का कहना है लोगों की सेवा करना पुण्य का काम है वह लगातार अपने बच्चे और ग्रामीणों की देखभाल के लिए सेवा कर रही हैं इससे पहले शहर के विभिन्न निजी अस्पतालों में सेवाएं दे चुकी तब जब कि देश महामारी को झेल रहा है, इस महिला डॉक्टर को लगता है कि यह समय सभी माताओं के लिए सिर्फ जिम्मेदार माता बनने का नहीं बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनने के साथ-साथ राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझने का समय है. वह कहती हैं, "मुझे लगता है कि हमारे आसपास के परिदृश्य को देखते हुए यह माना जाता है कि सभी माताएं सिर्फ जिम्मेदार मां नहीं हैं, बल्कि ज़िम्मेदार नागरिक भी हैं. वे बच्चों को ज़िम्मेदार नागरिक बनना सिखाती हैं और राष्ट्र के लिए यह काम करती हैं."


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