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छतरपुर में विरोध का बदलता स्वरूप चिंताजनक,खाकी का अपमान,समाज का नुकसान

छतरपुर में बिगड़ता माहौल विरोध के नाम पर खाकी से बदसलूकी कब तक ? छतरपुर जिले का माहौल इन दिनों चिंताजनक होता जा रहा है मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला में किसी भी प्रकार का ज्ञापन सौंपना हो या विरोध प्रदर्शन करना हो,कुछ लोग अपनी सीमाएँ लांघते हुए खाकी वर्दी के साथ बदसलूकी पर उतारू हो जाते हैं।  यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि समाज की सोच पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।विरोध करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाना गलत नहीं है, लेकिन उस आवाज में संयम और मर्यादा होना भी उतना ही आवश्यक है।  पुलिसकर्मी हमारी सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं। वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं किसी के बेटे,भाई या पिता हैं। ऐसे में ज्ञापन सौंपते समय या प्रदर्शन के दौरान उनसे अभद्रता करना या खाकी पर हाथ उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। खाकी वर्दी व्यवस्था और सुरक्षा का प्रतीक है यदि हम उसी व्यवस्था को कमजोर करने लगेंगे,तो आखिर हमारी मांगें पूरी कैसे होंगी? पुलिस को प्रताड़ित कर, उन्हें उकसा कर या उन पर प्रहार कर हम अपनी ही समस्याओं ...

कुत्ते का अंतिम संस्कार, प्रयागराज में होगा अस्थि विसर्जन,सिर्फ़ पालतू नहीं…परिवार का बेटा था तिलकधारी

ग्राम पिपट में पालतू कुत्ते का हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार

छतरपुर। राजनगर थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पिपट से इंसान और जानवर के रिश्ते की एक अनोखी मिसाल सामने आई है। यहाँ एक पालतू कुत्ते तिलकधारी का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों से किया गया। तिलकधारी को उसके मालिक सद्दू पटेरिया ने बेटे की तरह पाला था और अब उसकी मृत्यु के बाद परिवार ने इंसानी संस्कारों के अनुसार विदाई दी है।

जानकारी के अनुसार करीब दस वर्ष पूर्व सद्दू पटेरिया को एक बेसहारा देशी नस्ल की कुतिया सड़क पर मिली थी। सद्दू ने उसे अपने घर में आश्रय दिया और नाम रखा रामकली। कुछ समय बाद रामकली की मृत्यु हो गई, लेकिन उसने अपने पीछे एक नन्हा सा बच्चा छोड़ा। सद्दू ने उस मासूम पिल्ले को भी पालने का संकल्प लिया।

उस पिल्ले का नामकरण बड़े भव्य तरीके से किया गया। ग्राम पंचायत क्षेत्र में चौक समारोह रखा गया, जहाँ बैंड-बाजे के साथ नामकरण हुआ। गाँव के लोग आमंत्रित किए गए, दावत का आयोजन हुआ, और पूरे हर्षोल्लास के साथ पिल्ले का नाम तिलकधारी रखा गया। उस समय यह घटना पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी थी।

समय बीतने के साथ तिलकधारी पटेरिया परिवार का हिस्सा बन गया। सद्दू पटेरिया ने उसे सिर्फ़ पालतू जानवर नहीं माना, बल्कि अपने बेटे की तरह स्नेह और प्यार दिया। तिलकधारी की देखभाल में किसी तरह की कमी नहीं छोड़ी गई।

अब वही तिलकधारी इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। उसकी मौत से पूरा परिवार ग़मगीन है। मालिक सद्दू पटेरिया ने हिंदू रीति-रिवाजों के साथ उसका अंतिम संस्कार किया। खास बात यह है कि सद्दू ने तिलकधारी की अस्थियों को प्रयागराज ले जाकर गंगा में विसर्जित करने का निर्णय लिया है।

गाँव में इस घटना की चर्चा हर किसी की जुबान पर है। लोगों का कहना है कि आज के समय में जहाँ इंसान, इंसान से रिश्ते भूलता जा रहा है, वहीं एक व्यक्ति ने जानवर को अपना परिवार मानकर ऐसी मिसाल पेश की है, जो समाज को सोचने पर मजबूर करती है।

यह घटना सिर्फ़ एक कुत्ते के अंतिम संस्कार की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसानियत, मोहब्बत और अपनापन की सबसे बड़ी तस्वीर है।



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