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केन-बेतवा में मुआवजा या खेल ? सूत्रों के मुताबिक बाहरी लोगों ने भी फर्जी तरीके से लिया मुआवजा क्या अब जांच में होगी वसूली ?

केन-बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा… या फिर “मौका” वितरण ? केन बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा वितरण में विसंगतियों को लेकर चल रहे प्रदर्शन प्रशासन के आश्वासन के बाद स्थगित कर दिया गया है लेकिन मामले में अब सबकी नजर प्रशासन की जांच में टिकी हुई है  सूत्रों के अनुसार छतरपुर जिले के डूब क्षेत्र के गांवों में बड़ा फर्जीवाड़ा किया गया है जिनका हक था,वो लाइन में खड़े रह गए…और जिनका कोई लेना-देना नहीं गांव के भी नहीं ऐसे कई लोगों के खातों में पैसा पहुंच गया ये सिस्टम की गलती है या सेटिंग का कमाल ? पिछले 12 दिन तक ग्रामीण चिता पर लेटे रहे प्रदर्शन किया,तब जाकर फाइलें खुलीं और जांच दल बन गया। सवाल ये है क्या जांच सच सामने लाएगी ? अब सीधे सवाल प्रशासन से क्या फर्जी मुआवजा लेने वालों से वसूली होगी ? क्या मिलीभगत करने वाले पटवारी बच पाएंगे ? और जो असली हकदार हैं…उन्हें उनका हक मिलेगा ? या फिर हमेशा की तरह…मामला उठेगा,सुर्खियां बनेगी,और फिर सब कुछ “ठंडे बस्ते” में चला जाएगा ?

चूहों ने छतरपुर जिला स्वास्थ्य विभाग की खोली पोल डिजिटल इंडिया के अस्पतालों में चूहों का राज सिस्टम सवालों के घेरे में

छतरपुर जिला अस्पताल... वो जगह, जहाँ जिंदगी की पहली सांस लेने वाले मासूमों को सबसे सुरक्षित होना चाहिए... लेकिन हकीकत कुछ और है।
यहाँ रातें माताओं के लिए खौफ बन गई हैं। नींद तो दूर, पलक झपकाना भी डरावना है... क्योंकि हर वक्त डर है कि कहीं चूहे उनके लाल तक न पहुँच जाएं।

याद कीजिए इंदौर का सरकारी अस्पताल... जहाँ चूहों ने दो नवजातों की जान ले ली थी। वही भयावह तस्वीर अब छतरपुर में भी नजर आने लगी है।
बच्चा वार्ड हो, प्रसूता वार्ड हो, या दवा की अलमारी... हर जगह चूहों का कब्ज़ा। इतना ही नहीं, रिकॉर्ड रूम तक सुरक्षित नहीं बचा। डॉक्टर तक परेशान हैं... लेकिन सिस्टम खामोश है।

सबसे बड़ा सवाल डेढ़ लाख रुपये में चूहे मारने का ठेका आखिर गया कहाँ ? दवा छिड़काव का कोई रिकॉर्ड नहीं... और अब ठेका खत्म तो नया टेंडर जारी करने की तैयारी। क्या मासूमों की सुरक्षा टेंडरों और कागजों पर छोड़ दी जाएगी ? कहीं ऐसा न हो कि कल को छतरपुर भी वही दर्दनाक घटना देखे... जिसकी गूंज इंदौर से पूरे प्रदेश में सुनाई दी थी।

फिलहाल शुक्र है कि कोई नवजात चूहों का शिकार नहीं बना... लेकिन ये "शुक्र" कब तक रहेगा ? यह सवाल हर माँ की आँखों में तैर रहा है।

दूसरा बड़ा सवाल...
क्या सिर्फ चूहों को मारना ही समाधान है ? आखिर क्यों अस्पतालों में व्यवस्था की जगह अव्यवस्था है ? क्या डिजिटल इंडिया में भी हमारे अस्पताल इतने लाचार हैं कि चूहे घर बना लें... और इंसान इलाज खोजता रह जाए ? छतरपुर के जिला अस्पताल में चूहों का आतंक नहीं...बल्कि सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है।

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