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मैं खजुराहो मुझे बचाओ - मंदिरों की नगरी में नशे का साया जिम्मेदार बेखबर ?

खजुराहो के वेस्टर्न ग्रुप ऑफ टेंपल के मुख्य द्वार के पास शराब ठेका,चंदेलकालीन शिवसागर तालाब बना शराबियों का अड्डा जिम्मेदार बेखबर  खजुराहो केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और विश्व मंच पर देश की ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। यहां स्थित खजुराहो मंदिर समूह को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है और हर साल देश-विदेश से हजारों पर्यटक इसकी अद्भुत स्थापत्य कला और इतिहास को देखने पहुंचते हैं। विशेष रूप से वेस्टर्न ग्रुप ऑफ टेंपल खजुराहो का सबसे प्रमुख और सर्वाधिक भ्रमण किया जाने वाला परिसर है। लेकिन इन दिनों जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे खजुराहो की प्रतिष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। वेस्टर्न ग्रुप ऑफ टेंपल के मुख्य प्रवेश द्वार के पास संचालित शराब ठेके से शराब खरीदकर कुछ लोग पास स्थित चंदेलकालीन शिवसागर तालाब में बैठकर खुलेआम शराब पीते दिखाई दे रहे हैं। तालाब के किनारों पर बिखरी शराब की बोतलें और गंदगी न केवल ऐतिहासिक धरोहर की गरिमा को ठेस पहुंचा रही हैं, बल्कि आने वाले पर्यटकों के सामने भी खजुराहो की नकारात्मक छवि प्रस्तुत कर रही हैं। खजुराहो की प...

चूहों ने छतरपुर जिला स्वास्थ्य विभाग की खोली पोल डिजिटल इंडिया के अस्पतालों में चूहों का राज सिस्टम सवालों के घेरे में

छतरपुर जिला अस्पताल... वो जगह, जहाँ जिंदगी की पहली सांस लेने वाले मासूमों को सबसे सुरक्षित होना चाहिए... लेकिन हकीकत कुछ और है।
यहाँ रातें माताओं के लिए खौफ बन गई हैं। नींद तो दूर, पलक झपकाना भी डरावना है... क्योंकि हर वक्त डर है कि कहीं चूहे उनके लाल तक न पहुँच जाएं।

याद कीजिए इंदौर का सरकारी अस्पताल... जहाँ चूहों ने दो नवजातों की जान ले ली थी। वही भयावह तस्वीर अब छतरपुर में भी नजर आने लगी है।
बच्चा वार्ड हो, प्रसूता वार्ड हो, या दवा की अलमारी... हर जगह चूहों का कब्ज़ा। इतना ही नहीं, रिकॉर्ड रूम तक सुरक्षित नहीं बचा। डॉक्टर तक परेशान हैं... लेकिन सिस्टम खामोश है।

सबसे बड़ा सवाल डेढ़ लाख रुपये में चूहे मारने का ठेका आखिर गया कहाँ ? दवा छिड़काव का कोई रिकॉर्ड नहीं... और अब ठेका खत्म तो नया टेंडर जारी करने की तैयारी। क्या मासूमों की सुरक्षा टेंडरों और कागजों पर छोड़ दी जाएगी ? कहीं ऐसा न हो कि कल को छतरपुर भी वही दर्दनाक घटना देखे... जिसकी गूंज इंदौर से पूरे प्रदेश में सुनाई दी थी।

फिलहाल शुक्र है कि कोई नवजात चूहों का शिकार नहीं बना... लेकिन ये "शुक्र" कब तक रहेगा ? यह सवाल हर माँ की आँखों में तैर रहा है।

दूसरा बड़ा सवाल...
क्या सिर्फ चूहों को मारना ही समाधान है ? आखिर क्यों अस्पतालों में व्यवस्था की जगह अव्यवस्था है ? क्या डिजिटल इंडिया में भी हमारे अस्पताल इतने लाचार हैं कि चूहे घर बना लें... और इंसान इलाज खोजता रह जाए ? छतरपुर के जिला अस्पताल में चूहों का आतंक नहीं...बल्कि सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है।

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